रंजीत सिंह ने बताया कि गुरुद्वारे में कुआं है, जिसमें गुरु तेग बहादुर ने गंगा जी को बुलाया। तबसे इस कुएं का जल संगत के लिए अमृत के समान है। उन्होंने बताया कि ग्रहण के दिन गंगा स्नान करने के लिए गुरु ने घर में ही गंगा को बुला लिया था।
उन्होंने अपने चरण से एक शिला हटा तो गंगा का जल प्रवाहित होने लगा। उन्होंने स्नान करने के बाद गंगा के प्रवाह को रोकने के लिए दोबारा शिला वहीं रख दी। मगर वहां श्रोत (बाउली साहिब) आज भी मौजूद है।
प्रचार के दौरान ही गुरु गोविंद सिंह का हुआ था जन्म
सिख धर्म के प्रथम गुरू धन्य गुरुनानक देव महाराज के सिख धर्म मिशन का प्रचार करने गुरु तेग बहादुर निकले थे। वह दिल्ली, मथुरा, कानपुर से होते हुए प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पहुंचे थे। यहां से मिर्जापुर होते हुए काशी आए। वह काशी से सासाराम, गया होकर पटना पहुंचे। वहीं पर उनके बेटे गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ।
अग्रहरि व सोनार समाज के भी लोग बन गए संगत
काशी में गुरु तेग बहादुर की तपस्या देखते हुए और समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों ने भी सिख धर्म को स्वीकार कर लिया था। अग्रहरि, सोनार, खत्री, हलवाई आदि समाज के लोगों ने भी इस धर्म को स्वीकार कर लिया। उनके शिष्य मिर्जापुर, चंदौली व जौनपुर के भी लोग बने।