उन्होंने करीब 33 साल तक सरसंघचालक का दायित्व संभालते हुए संघ को स्वर्णिम काल तक पहुंचाया। प्राचीन इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनोद कुमार जायसवाल का कहना है कि बीएचयू से भी गोलवलकर का गहरा जुड़ाव था। उन्होंने 10 साल तक यहां अध्ययन-अध्यापन किया।
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के सानिध्य में रहते हुए वह स्वाभिमान की दीक्षा ग्रहण कर मां भारती की सेवा में लगे रहे। बीए के छात्रों को राजनीतिशास्त्र व अंग्रेजी भी पढ़ाते रहे। इस वजह से गोलवलकर को गुरुजी कह कर संबोधित किया जाने लगा और अंत तक गोलवलकर की जगह गुरुजी संबोधन उनके पहचान का पर्याय बन गया।
डॉ. विनोद जायसवाल ने बताया कि गोलवलकर ने बीएचयू के ब्रोचा छात्रावास के कमरा संख्या 309 में रहते हुए प्राणीशास्त्र में 1924-26 में बीएससी और 1926-28 में एमएससी की डिग्री हासिल की। इसके साथ ही 1931 से 1933 तक प्राणी शास्त्र विभाग में ही अध्यापन-कार्य भी किया।
बीएचयू में 1931 में संघ की शाखा स्थापित हुई और जिसमें गुरुजी ने संघचालक के दायित्व का निर्वहन किया। आध्यात्मिक प्रवृत्ति व भारत माता के प्रति ध्येय की समानता के कारण महामना के स्नेह का भागी बन कर 1937-38 में दो कमरों का भवन संघ कार्यालय के रूप में बीएचयू परिसर (वर्तमान विधि संकाय में) में बनवा दिए।
महामना ने उस समय प्रति कुलपति राजा ज्वाला प्रसाद को एक छोटा सा भवन बनाने के लिए आदेश दिया, इसके फलस्वरूप संघ स्टेडियम नाम से लॉ कॉलेज (वर्तमान विधि संकाय) के पास एक छोटा सा भवन संघ को प्राप्त हुआ। विश्वविद्यालयीय अभिलेखों में इसे आरएसएस आर्मरी कहा गया है।