आज ही के दिन 24 अक्तूबर 2017 को कोलकाता में ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी हमेशा के लिए दूर चली गई थीं। ठुमरी की रानी के नाम से मशहूर गिरिजा संगीत की दुनिया का जाना-माना चेहरा थीं। उनके चाहने वाले उन्हें प्यार से अप्पा जी कहकर बुलाते थे।
अपनी आखिरी यात्रा से करीब एक माह पहले उन्होंने दिल्ली में प्रस्तुति दी थी। किसी ने नहीं सोचा था, वो आखिरी बार बनारस घराने की इस विश्वस्तरीय आवाज को सुन रहे हैं। चेहरे पर भले ही तजुर्बे ने हस्ताक्षर किए हों, बतौर फनकार उनका उत्साह चिरयौवन था।
उनके साथ उस कार्यक्रम में उनकी शिष्या डॉ. रीता देब भी थीं। उस दिन को याद करके रीता देब बताती हैं कि कहीं से नहीं लगा था कि उनकी पूरी उम्र इसी ठुमरी, दादरा और होरी गाते बीती हो। किसी भी नए कलाकार जैसा रियाज करती थीं और हर बोल को लय के साथ उठाती गिराती थीं।
मशहूर ठुमरी साम्राज्ञी पद्मविभूषण गिरिजा देवी की खासियत थी हर विधा के शब्दों को अपनी गायकी से अमर कर देना। ठुमरी ही नहीं, ख्याल, टप्पा, तराना, सदरा भी उनकी आवाज में संजीवनी संगीत बन जाते थे।
पारंपरिक लोक संगीत में उनके गाए होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन आज भी लोगों का मन मोह जाते हैं। बीएचयू में विजिटिंग प्रोफेसर गिरिजा देवी भी रहीं तो उनकी शिष्या मंजू सुंदरम् ने भी इस पद को सुशोभित किया। करीब 1963 से अप्पा जी से मंजू सुंदरम् को भी ठुमरी सीखने का मौका मिला।