स्कंद पुराण के काशी खंड में उल्लिखित इन श्लोकों में उत्तरार्क कुंड की महिमा गाई गई है। 12वीं-13वीं शताब्दी से पहले काशी का उत्तरार्क कुंड तीर्थ सूर्योपासना का अद्वितीय केंद्र था। भगवान सूर्य के इस विशाल मंदिर परिसर में बौद्ध विहारों के भी अवशेष देखे जा सकते हैं। फिलहाल अलईपुर में सिटी रेलवे स्टेशन के ठीक सामने बकरिया कुंड के नाम से विख्यात सनातनियों के आस्था के केंद्र इस कुंड की दुर्दशा चरम पर है। भीटे को पाटकर दो दर्जन से अधिक भवन तो बना ही लिए गए हैं, सरपत की झाड़ियों और कचरे के चलते लोगों ने कुंड का उपयोग करना बंद कर दिया है। आसपास की बस्तियों के लोग अब इसी कुंड में कूड़ा फेंक रहे हैं।
बकरिया कुंड पर औरतें हबुआती हैं और डफली बजाते हुए डफाली गाजी मियां की शहादत गाते हैं। कोई नारियल चढ़ाता है तो कोई मुर्गा। इस बार निकली गाजी मियां की बारात कुंड परिसर में लौट आई है। काशी की उत्तरी सीमा पर स्थित इस तीर्थ का पौराणिक नाम उत्तरार्क कुंड या बर्करी कुंड है। यहां उत्तरार्क मंदिर में सूर्यदेव की पूजा-अर्चना भी होती है।
काशी में उत्तरार्क भगवान की विशाल प्रतिमा कुंड परिसर में स्थित मंदिर में अब भी सुरक्षित है। इस प्रतिमा के दर्शन के लिए लोग पहुंचते हैं। शुभ कार्यों की शुरुआत इसी कुंड परिसर में शहनाई, नगाड़ा बजाकर की जाती है। अब कुंड को
पाटकर कब्जा करने की होड़ मची हुई है। पुजारी की पत्नी कांति देवी बताती हैं कि परिसर पर कब्जा करने वाले रात को ईंट-पत्थर गिराते हैं और सुबह पुलिस को सूचना दी जाती है।
पुलिस की मदद से अक्सर अवैध निर्माण करने वालों को खदेड़ा जाता है। इसी कुंड परिसर से कभी भगवान कृष्ण की गोवर्धनधारी रूप वाली गुप्तकालीन मूर्ति मिली थी जिसे बीएचयू के भारत कला भवन में रखा गया है। कहा जाता है कि मुगलों के आक्रमण से पहले यहां भव्य कृष्ण मंदिर था। बौद्ध विहारों के अवशेष भी इस कुंड के आसपास पड़े हैं।