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पूर्वांचल में बापू की यादें: कहीं बग्घी से पहुंचे, कहीं खादी की विरासत; कहीं आज भी धूल में दबे हैं उनके निशान

Fri, 02 Oct 2026 01:28 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

पूर्वांचल की धरती पर बापू की अमिट स्मृतियां हैं। महात्मा गांधी गाजीपुर में बग्घी से पहुंचे थे। वहीं सोनभद्र में आज भी खादी की विरासत संभाली जा रही है। हालांकि कई जिलों में आज भी उनके निशान धूल में दबे हैं। 
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गांधी जयंती विशेष - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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विद्यापीठ में जहां ठहरे थे बापू, वहां अब तक नहीं बना म्यूजियम

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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ का वो कमरा, जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के समय ठहरे थे, वहां बापू के कक्ष का बोर्ड लग गया, लेकिन अब तक म्यूजियम नहीं बन सका है। छात्र-छात्राओं के लिए इस कमरे को म्यूजियम के रूप में देखने का सपना अधूरा ही है। इस तरह की स्थिति तब है, जब कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन को खुद राज्यपाल भी इसके लिए निर्देशित कर चुकी हैं। विश्वविद्यालय में यह कमरा भी नियमित रूप से नहीं खुल पाता है, जिससे छात्र-छात्राओं को बापू से जुड़ी स्मृतियों को जानने का मौका मिल सके।

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विश्वविद्यालय में मानविकी संकाय में प्रथम तल पर ही बापू का वो कमरा है, जहां वह 26 जुलाई से 2 अगस्त 1934 को काशी में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी समिति और केंद्रीय हरिजन सेवक संघ के अधिवेशन के दौरान ठहरे थे। पत्रकारिता विभाग के पास बने इस कमरे में बापू की कई पुरानी तस्वीरें हैं और काशी विद्यापीठ की स्थापना के लिए किए गए प्रयासों के साथ ही अन्य कई अवसरों पर लिखे गए पत्र भी लगाए गए हैं। एक अक्तूबर को दोपहर में यह कमरा कुछ देर के लिए खुला। एक कर्मचारी अंदर गया, थोड़ी देर में बाहर आकर उसे बंद कर दिया गया। 

बापू कक्ष में हैं ये दुर्लभ तस्वीरें

  • भारत माता मंदिर को बनाने वाले कारीगरों के साथ बापू की बातचीत
  • डॉ. संपूर्णानंद द्वारा महात्मा गांधी को लिखा गया पत्र
  • आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास के उद्घाटन पर डॉ. संपूर्णानंद, पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आचार्य बीरबल सिंह
  • भारत माता मंदिर के उद्घाटन 25 अक्टूबर 1936 की तस्वीरें
  • बापू का विश्राम स्थल, उस पर चरखा

 

बापू के कक्ष को म्यूजियम बनाने की दिशा में पहल चल रही है। इसके लिए संस्कृति मंत्रालय सहित अन्य जगहों पर पत्र लिखा गया है। जब तक म्यूजियम नहीं बन पा रहा है, तब तक यहां रामभजन बजाया जाता है। नए सिरे से एक बार फिर पहल की जाएगी। -प्रो. एके त्यागी, कुलपति

न ब्रांडिंग, न तामझाम... गांव से हर साल 15 लाख मीटर खादी का कारोबार
आधुनिक फैशन और बड़े ब्रांडों की चमक के बीच सोनभद्र का एक गांव 46 साल से खादी की विरासत संभाले हुए है। न बड़ी ब्रांडिंग, न तामझाम और न ही आलीशान शोरूम। इसके बावजूद सोनभद्र जिले में म्योरपुर के गोविंदपुर से हर साल 15 लाख मीटर से अधिक खादी के कपड़े का कारोबार होता है। हाल के वर्षों में खादी की मांग करीब 25 फीसदी बढ़ी है। हालांकि बढ़ती लागत और बुनकरों की कमी कारोबार के विस्तार में बड़ी बाधा बनी हुई है। म्योरपुर क्षेत्र के गोविंदपुर में वनवासी सेवा आश्रम ने वर्ष 1979-80 में खादी कारोबार की शुरुआत की थी। यहां तैयार खादी सोनभद्र के अलावा वाराणसी और गोरखपुर समेत पूर्वांचल के कई जिलों तक पहुंचती है। कभी चंडीगढ़ तक इसकी आपूर्ति होती थी, लेकिन लोगों की पसंद बदलने से यह सिलसिला बंद हो गया। यहां सूती खादी में कुर्ता-पायजामा, लुंगी, साड़ी, गमछा और धोती के अलावा सिल्क के कपड़े, स्टॉल और शॉल तैयार किए जाते हैं। रेडीमेड कपड़े भी उपलब्ध हैं। प्रबंधन के अनुसार खादी की मांग बढ़ी है, लेकिन आधुनिक उपकरणों के अभाव और कुशल बुनकरों की कमी से उत्पादन बढ़ाना चुनौती बना हुआ है। 


 
50 परिवारों का सीधा जुड़ाव, 38 महिलाएं संभाल रहीं बुनकरी 
खादी के इस कारोबार से म्योरपुर क्षेत्र के करीब 50 परिवार सीधे जुड़े हैं। बीजपुर और बभनी के बुनाई केंद्रों से 38 महिलाएं जुड़ी हैं। सामान्य ग्रामीण परिवेश में ये महिलाएं और पुरुष चरखे-करघे के जरिए खादी की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

वनवासी सेवा आश्रम की संचालक शुभा प्रेम के अनुसार खादी सिर्फ वस्त्र नहीं, बल्कि संस्कृति है। उनका कहना है कि यह बड़े ब्रांडों के मुकाबले सस्ती और आरामदायक भी है। ढाई सौ रुपये मीटर से कम कीमत में भी खादी उपलब्ध है।



फसल कटने और गांधी जयंती के बाद बढ़ती है बिक्री 
शोरूम कर्मियों के मुताबिक गांवों में खादी की बिक्री का सीधा संबंध किसानों की आय से है। फसल कटने और घर अनाज पहुंचने के बाद बिक्री में तेजी आती है। गांधी जयंती के आसपास मिलने वाली छूट का भी ग्राहक इंतजार करते हैं। ऐसे में खादी को गांव के साथ शहर का ब्रांड बनाना जरूरी बताया जा रहा है। गोविंदपुर खादी केंद्र के प्रबंधन के अनुसार अत्याधुनिक उपकरण मिलने और बुनकरों की कमी दूर होने पर उत्पादन और बाजार दोनों का विस्तार हो सकता है। फिलहाल सेमी ऑटोमेटिक करघों पर काम करने में अधिक मेहनत लगती है। खादी को बढ़ावा देने के लिए ग्रामोद्योग विभाग की ओर से प्रशिक्षण, फैशन शो और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।
 
खादी सिर्फ एक वस्त्र नहीं संस्कृति है, इसे समझना होगा। यह महंगी नहीं बड़े ब्रांडों के मुकाबले सस्ती और आरामदायक भी है। ढाई सौ रुपये प्रति मीटर से भी कम में लोगों के लिए उपलब्ध है। महंगे ब्रांड भी एक हजार रुपये मीटर तक की कीमत में खरीदे जा सकते हैं। जरूरत है तो सिर्फ सोच बदलने की। -शुभा प्रेम, संचालक वनवासी सेवा आश्रम
 
खादी के संवर्धन के लिए कई योजनाएं चलाई जा रहीं हैं। इस धंधे से जुड़े लोगों को प्रशिक्षित करने के साथ ही महानगरों में खादी के फैशन-शो, विशेष प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं। खादी और इसके धंधे की तरफ लोगों को जुड़ाव बढ़े इसके लिए लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है। -गौतम त्रिपाठी, जिला ग्रामोद्योग अधिकारी

सैदपुर में मोटर गाड़ी हुई खराब तो नंदगंज से आई बग्घी से गाजीपुर पहुंचे थे बापू
गाजीपुर में आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की सैदपुर यात्रा इतिहास के पन्नों में दर्ज है। दो अक्तूबर 1929 को सैदपुर पहुंचे गांधी ने यहां चरखा संघ का उद्घाटन कर खादी और स्वराज का संदेश दिया था। कैथी से शुरू हुई उनकी यात्रा सैदपुर होते हुए गाजीपुर के लंका मैदान तक पहुंची थी। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वराज आंदोलन की अलख जगाने निकले गांधी को देखने और सुनने के लिए जगह-जगह जनसैलाब उमड़ा था।

साहित्य भूषण से सम्मानित डॉ. इंदीवर (78) बताते हैं कि दो अक्तूबर 1929 को गांधी नगर के शांति कुटीर स्थित पंडित आत्माराम पांडेय के आवास पर कुछ देर रुके थे। यहां खादी और आजादी को लेकर चर्चा हुई। गांधी के पहुंचने की खबर पर लोगों की उत्सुकता बढ़ती गई और भीड़ जमा होने लगी। इसके बाद वह शांति कुटीर से बूढ़े महादेव मंदिर तक पैदल गए। यहीं उन्होंने चरखा संघ का उद्घाटन किया।

इस दौरान महिलाओं ने हाथ से तैयार खादी वस्त्र पर लिखे मांग पत्र को गांधी को सौंपा। उपस्थित जनसमुदाय की ओर से एकत्रित 500 रुपये की सहयोग राशि की थैली भी उन्हें दी गई। डॉ. इंदीवर बताते हैं कि इससे पहले गांधी वाराणसी से नाव पर सवार होकर गंगा-गोमती संगम स्थल कैथी पहुंचे थे। उनके साथ पत्नी कस्तूरबा गांधी, बहन मीरा, बेटे देवदास गांधी, आचार्य कृपलानी और महादेव देसाई भी थे। उस समय कैथी गाजीपुर जनपद का हिस्सा था, जो अब वाराणसी में है। नाव से उतरते ही लोगों ने गांधी का मालाओं से स्वागत किया। भीड़ लगातार बढ़ती गई और एक समय लोग उनके बेहद करीब पहुंच गए। प्रबुद्ध लोगों के समझाने पर किसी तरह भीड़ को नियंत्रित किया गया।

डॉ. इंदीवर बताते हैं कि चरखा संघ के उद्घाटन के बाद गांधी को गाजीपुर के लंका मैदान पहुंचना था। वहां उनके स्वराज आंदोलन से जुड़े भाषण को सुनने के लिए लोग दिनभर से इंतजार कर रहे थे। गांधी मोटर गाड़ी से सैदपुर पहुंचे थे, लेकिन यहां उनकी गाड़ी खराब हो गई। कई प्रयास के बाद भी गाड़ी ठीक नहीं हो सकी। इसके बाद नंदगंज के एक साहूकार के यहां से घोड़ा गाड़ी (बग्गी) मंगाई गई और गांधी को उसी से गाजीपुर भेजा गया। गाजीपुर के गोरा बाजार स्थित आईना कोठी में गांधी रुके। रात करीब आठ बजे लंका मैदान में उनका भाषण हुआ। गांधी के दर्शन और भाषण सुनने के लिए लोग दिनभर मैदान में खड़े रहे। शाम होते-होते मैदान जनसमूह से भर गया और लोगों ने बड़े चाव से गांधी का स्वराज आंदोलन केंद्रित भाषण सुना। 

महापुरुषों को पर्वों पर नमन, सम्मान सिर्फ रस्मों तक, धूल बता रही उपेक्षा की कहानी
देश की आजादी और नवनिर्माण में अप्रतिम योगदान देने वाले महापुरुषों की प्रतिमाएं जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते बदहाली का शिकार हैं। जिन्हें नमन कर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा लेनी चाहिए, वे प्रतिमाएं आज धूल, पक्षियों की बीट और गंदगी के साये में अपनी पहचान खो रही हैं। मऊ जिले में कलेक्ट्रेट परिसर से लेकर कस्बों तक इन धरोहरों का यही हाल है।



जिला प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र कलेक्ट्रेट परिसर में स्थापित दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और पूर्व सांसद स्व. जयबहादुर सिंह व स्व. झारखंडे राय की प्रतिमाएं इस समय उपेक्षा का दंश झेल रही हैं। कलेक्ट्रेट आने-जाने वाले आला अधिकारियों और कर्मचारियों की नजर रोज इन प्रतिमाओं पर पड़ती है, लेकिन इसके बावजूद इन पर जमी धूल की परतें साफ करने की सुध किसी को नहीं है। इसके अलावा नगर के गाजीपुर तिराहे पर लगी पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा का भी रंग रोगन नहीं कराया गया है। यहां भी बदहाली का आलम देखा जा सकता है।

यही हाल घोसी स्थित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा का भी है। सत्य और अहिंसा का संदेश देने वाले बापू की यह प्रतिमा लंबे समय से रखरखाव के अभाव में उपेक्षित पड़ी है। यहां मनोनीत सभासद के सवाल उठाने के बाद थोड़ा रंगरोगन तो जरूर कराया गया, लेकिन इसके अलावा केवल स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और महात्मा गांधी जयंती पर ही इसकी सफाई कराई जाती है। इसके अलावा साल भर यह प्रतिमा धूल फांकती रहती है। 

2 अक्तूबर 1929 को जौनपुर आए थे बापू, खादी के लिए मिली थी दो हजार की थैली
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दो बार जौनपुर आए। पहली बार फरवरी 1921 में काशी से लखनऊ जाते समय जौनपुर रेलवे स्टेशन पर करीब दस मिनट रुके। दूसरी बार 2 अक्तूबर 1929 को अपने जन्मदिन पर यहां पहुंचे और करीब तीन घंटे बिताए। दूसरी यात्रा में रामलीला मैदान की सभा में खादी के लिए उन्हें दो हजार रुपये की थैली भेंट की गई। महिलाओं ने भी नकदी और अपने गहने दिए। 

रासमंडल स्थित दिवंगत बाबू रामेश्वर प्रसाद सिंह का मकान आज भी महात्मा गांधी के जौनपुर आगमन की स्मृतियां संजोए है। मकान पर लगे शिलापट्ट में उनके आगमन का उल्लेख है। दोनों यात्राओं का विवरण वरिष्ठ लेखक दिवंगत कुमार अजय की पुस्तक ‘राग जौनपुरी’ में भी मिलता है। 



बाबू रामेश्वर प्रसाद सिंह के प्रपौत्र अपल सिंह बताते हैं कि रामलीला मैदान की सभा में बापू ने कहा था, ‘‘वक्त की कीमत लग जाती है तो हम समझते हैं स्वराज्य करीब आ रहा है।’ उन्होंने साम्राज्यवादी शोषण का उल्लेख करते हुए लोगों से खद्दर पहनने की अपील की। उनके आह्वान पर सभा में दोनों चेयरमैन गुरु सरन लाल और राजा साहब समेत कई प्रतिष्ठित लोगों ने पहली बार खद्दर धारण किया। 

रामलीला मैदान में करीब 15 मिनट संबोधन के बाद बापू रामेश्वर परिसर स्थित उस मकान में पहुंचे। यहां महिलाओं की सभा हुई और महिलाओं ने बापू को नकदी और अपने गहने भेंट किए। इसके बाद राष्ट्रपिता, आचार्य जेबी कृपलानी और श्रीप्रकाश के साथ बड़ागांव रवाना हो गए। कुछ जौनपुरी लोग उन्हें विदा करने बड़ागांव तक साथ गए। 

बापू की नजर में दूसरा बारदोली था बलिया
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बलिया जिले से गहरा रिश्ता रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में बलिया की भागीदारी से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी पत्रिका यंग इंडिया में लिखा था कि बलिया देश का दूसरा बारदौली है। दो अक्तूबर को बापू की 157वीं जयंती पर बलिया एक बार फिर उस इतिहास को याद कर रहा है। इस रिश्ते की जड़ें 1920-21 के आंदोलन में हैं। वर्ष 1920 में जब स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर गांधी जी के हाथों में आई और 1921 में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ा, तो उसकी सबसे चमत्कारिक प्रतिक्रिया बलिया में हुई। इस आंदोलन के तहत बार कौंसिल, कचहरी, स्कूल-कॉलेज, सरकारी दुकानों, नौकरियों और विदेशी वस्त्रों व सामान के बहिष्कार के साथ ही विदेशी वस्तुओं का परित्याग और खादी पहनना शामिल था।



बागी धरती ने बापू की अपील को माना
इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि बलिया की जनता ने बापू की अपील को अक्षरशः माना। इसका असर इस कदर रहा कि लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई, घर-घर चरखे पर सूत कातना और खादी पहनना शुरू कर दिया। नगरा के निवासी लक्ष्मी नारायण कांदू, जो जिले में गांजा के सबसे बड़े लाइसेंसी विक्रेता थे, ने अपना पूरा स्टॉक जला दिया और जीवन भर गांजा न बेचने की कसम खाई। कवि-अधिवक्ता गुरुमुख सिंह भक्त ने वकालत छोड़ दी, कचहरी के मुख्तार रामचंद्र लाल ने मुख्तारी छोड़ दी। रामहरख लाल, नगेश्वर उपाध्याय, अवध बिहारी पाण्डेय, मथुरा लाल, राम सनेही सिंह सहित बीसों लोगों ने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी। मुरली मनोहर लाल तो कानून की पढ़ाई छोड़कर इलाहाबाद से बलिया आ गए थे।

16 अक्तूबर 1925 को आए थे बलिया, एससी कॉलेज में हुई थी सभा
आजादी के जन-जागरण को देखने और आंदोलन को गति देने के लिए 16 अक्तूबर 1925 को गांधी जी बलिया आए थे। शहर के एससी कॉलेज के मैदान में उनकी विशाल सभा हुई थी। उन्हें सुनने के लिए पूरे जिले से लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। मंच को इतना ऊंचा बनाया गया था कि हर कोई बापू को देख सके। साहित्यकार शिव कुमार कौशिकेय ने बताया कि सभा में बापू ने अपने यंग इंडिया में लिखे लेख की चर्चा करते हुए कहा था कि जालिम सरकार नहीं रखनी है और हर व्यक्ति को अपने इस संदेश को आत्मसात कर आंदोलन को तेज करने का आह्वान किया था। बलिया से लौटने के बाद बापू ने नवजीवन में बलिया जिले की जनसभा के ऊंचाई पर बांस से बने हिलते मंच, जनसैलाब और आत्मीय सत्कार पर लिखा था। बापू ने अधिवक्ता मुरली मनोहर लाल के जगदीशपुर स्थित आवास पर थोड़ी देर भोजन और विश्राम भी किया था।

गांधीजी के जीवन दर्शन में प्रकृति संरक्षण की थी अवधारणा
वर्तमान समय में महात्मा गांधीजी की प्रकृति संरक्षण संबंधी विचारों की सार्थकता और बढ़ गई है। मानव की भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास हेतु जिस तरह से प्रकृति का अंधाधुंध दोहन एवं शोषण किया गया और किया जा रहा है, उससे पृथ्वी कराह उठी है। पर्यावरणविद् डॉ. गणेश पाठक ने बताया कि गांधी जी ने सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण संबंधित विचार प्रस्तुत नहीं किए हैं, किंतु सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, स्वच्छता, प्रेम, दया, उनका आश्रम जीवन, खादी आंदोलन, प्राकृतिक चिकित्सा, स्वदेशी आंदोलन, कुटीर उद्योग, ग्रामीण अर्थव्यवस्था संबंधी विचार, श्रम एवं रोजगार संबंधी विचार, सादा जीवन एवं उच्च विचार आदि उनके विचार हैं। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उनका तात्पर्य अहिंसा से है। कहा कि हम खादी आंदोलन के विचार को देखें तो यह पाते हैं कि खादी मात्र एक वस्त्र की विचारधारा नहीं है, बल्कि एक पूरी जीवन प्रणाली है।
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बापू की अस्थि लेकर भदोही आए थे जंग बहादुर बघेल, बनवाया था स्मारक
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भदोही से भावनात्मक रिश्ता रहा है। आजादी के आंदोलन में उनकी विचारधारा से प्रभावित बघेल परिवार ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसी परिवार की वजह से बापू की अस्थियों का एक हिस्सा आज भी भदोही के गोपीगंज क्षेत्र स्थित रामपुर कायस्थान गांव में सुरक्षित है।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1948 में अंतिम संस्कार के पश्चात उनकी अस्थियां उनके कुछ निकट सहयोगियों और अनुयायियों को दी गई थीं। गोपीगंज के जमींदार परिवार से जुड़े स्वतंत्रता सेनानी जंग बहादुर सिंह बघेल बापू की अस्थियों का एक हिस्सा अपने साथ रामपुर कायस्थान ले आए।



उन्होंने इन्हें कलश में सुरक्षित रखकर अपनी जमीन पर एक स्मारक का निर्माण कराया। बापू और बघेल परिवार के बीच आत्मीय संबंध था। जंग बहादुर सिंह बघेल अपनी भतीजी कृष्णा सिंह और भतीजे हृदय नारायण सिंह के साथ गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए थे।

वह लंबे समय तक साबरमती और वर्धा आश्रम में भी रहे। जंग बहादुर सिंह बघेल के प्रपौत्र ऋषि सिंह बघेल ने बताया कि महात्मा गांधी काशी नरेश के समय गोपीगंज के बघेल परिवार के अतिथि भी बने थे। उनके अलावा पं.जवाहर लाल नेहरू, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और विनोबा भावे जैसी महान विभूतियों का भी बघेल छावनी में आना-जाना रहा।

जंग बहादुर सिंह बघेल गांधीजी के बेहद करीब थे, लेकिन वह कभी प्रसिद्धि नहीं चाहते थे। इसी कारण गांधीजी की अस्थियों से जुड़े इस स्मारक को भी प्रचार से दूर रखा गया। 
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