काशी में चक्र तीर्थ भी है। कहते हैं कि सतयुग में भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से एक पवित्र धारा का उद्गम हुआ था। यही चक्र तीर्थ कुंड के नाम से विख्यात हुआ। सिगरा यानी पुराणों में जिसे शृंगी ऋषि का टीला कहा गया है, उस इलाके में चक्र तीर्थ पर कभी आस्था का मेला लगता था, लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि प्राचीन सांस्कृतिक नगरी में अब तक जीवित बचे इस कुंड को कूड़े से पाटा जा रहा है। प्रशासन ने सख्ती से हस्तक्षेप नहीं किया और ड्रेजिंग कराकर पानी नहीं बदला गया तो इस कुंड को भी बचाना मुश्किल हो जाएगा।
पौराणिक कुंडों की महिमा काशी में लगातार घट रही है। सिगरा की शास्त्री नगर कॉलोनी के मोड़ पर पानी के ओवरहेड टैंक के पीछे स्थित चक्र तीर्थ कुंड भी कूड़े और सीवर से भर गया है। कुंड परिसर में चक्रेश्वर महादेव का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र तो है लेकिन नशेड़ी और जुआरी वहां के पार्क में अड़ी जमाए रहते हैं। इस कुंड पर भूमाफिया की नजर भी लग गई है। कुंड को कूड़े से पाटा जा रहा है। भीटे पर कब्जा कर मकान भी बनाए लिए गए हैं।
लिंग पुराण में चक्रतीर्थ कुंड की महिमा का वर्णन किया गया है। पुराण के अनुसार चक्र तीर्थ कुंड में स्नान से आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाती है। यानी इस कुंड में डुबकी लगाने के बाद मुक्ति मिल जाती है। विश्व में सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का वर्णन मिलता है। इसमें चक्र तीर्थ का उल्लेख है। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से इस कुंड को खोदा था। महाभारत के वन पर्व में भी वाराणसी के एक तीर्थ के रूप में इसका वर्णन किया गया है लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और माफिया की मनमानी के चलते अब इसका अस्तित्व संकट में है। कुछ लोगों ने इस कुंड पर अपना नामांतरण भी करा लिया था। बाद में राजस्व परिषद में अपील कर राजस्व रिकार्ड से नाम कटवाया गया।