इन्हीं हकीकत को जानने के लिए जब हम बुनकर बाहुल्य क्षेत्र खीरीबाग पहुंचे तो वहां मजदूर अफजाल ने बताया कि एक जनपद एक उत्पाद में शामिल होने के बाद भी मऊ का साड़ी उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो गया है। कोरोना माहामारी के बीच न काम है, न ही पूरे हुए काम के पैसे मिल रहे हैं। इन्हीं सब के बीच सरकार से कोई उम्मीद थी कि वो बुनकरों की कुछ मदद करेगी मगर वो भी नहीं हुआ।
वहीं पहाड़पुरा निवासी शकील ने कहा कि रमजान में सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। पैसे नहीं हैं और इस महीने में सबसे ज्यादा खरीदारी होती है। आज बुनकर पूरी तरह से भूखमरी के कगार पर हैं। वहीं रुखसाना ने बताया कि आने वाले समय मे बच्ची की शादी है। बाजार पूरी तरस से बैठा हुआ है। काम नहीं है और जो बकाया पैसा है उसकी भी मिलने की अभी उम्मीद कम है।
यही हाल मऊ के सभी बुनकरों का है। ऐसे में साड़ी के इस कारोबार को अभी उठने में काफी महीनों लग जायेंगे। कोरोना की बीमारी से तो नहीं मगर इसके असर से मऊ का साड़ी व्यापार जरूर पूरी तरस से बीमार होकर वेंटिलेटर पर चला गया है।