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तबले की थाप पर काशी की धाक, यहां तबला की बारीकियां सीखने आते हैं विदेशी

Fri, 04 May 2018 03:53 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
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डीएवी इंटर कॉलेज स्थित केंद्र तबला के सुधिजनों के लिए बना बेहतरीन मंच - फोटो : अमर उजाला
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पूरी दुनिया में काशी के संगीत जगत को नई ऊंचाई देने वाले तबला सम्राट पंडित किशन महाराज की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए नवांकुरों की टीम पूरी शिद्दत से तैयार हो रही है। इनके तबला वादन की बारीकियां सीखने-जानने के लिए बेहतरीन मंच बना है, पं. किशन महाराजा व्याख्यान केंद्र। ‘विरासत लाइव’ शृंखला की चौथी कड़ी में हम आपको बता रहे हैं इसी केंद्र के बारे में।
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जहां पंडित किशन महाराज की तबले की गौरवमयी विरासत सहेजी और संवारी जा रही है। संगीत नाटक अकादमी की ओर से स्थापित ‘तबला सम्राट पं. किशन महाराज व्याख्यान केंद्र’ में प्रशिक्षण हासिल करने वालों में शहर की नवांकुर प्रतिभाओं के साथ ही देश के अन्य प्रांतों और विदेशों के भी तबला साधक शामिल हैं। 

केंद्र में पं. किशन महाराज के पुत्र पं. पूरण महाराज तबले का प्रशिक्षण देते हैं। हफ्ते में तीन दिन सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को उनके निर्देशन में यहां तबला वादन की रियाज चलती है। व्याख्यान केंद्र के प्रभारी व प्रधानाचार्य डॉ. राधाकांत मिश्र कहते हैं कि केंद्र सरकार की यह पहल बेहद सकारात्मक है।
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विद्यार्थियों को काशी के गौरवशाली अतीत और यहां की विभूतियों से परिचित कराने के लिए शुरू की गई इस पहल का असर आने वाले समय में और भी व्यापक होगा। नवांकुर प्रतिभाएं उत्साह से यहां तबला वादन की बारीकियां सीख रही हैं।

तबला सम्राट पंडित किशन महाराज ने पूरी दुनिया में काशी के संगीत जगत को नई पहचान दी। यह केंद्र उनकी विरासत को आगे बढ़ाने में पूरी शिद्दत से जुटा है। अकादमी की ओर से व्याख्यान केंद्र के लिए सभी संसाधन यहां मुहैया कराए गए हैं।

संगीत अध्यापक और समय-समय पर प्रशिक्षण के लिए व्यवस्था की गई है। दिल्ली सहित अन्य जगहों से समय-समय पर कला और संगीत के प्रशिक्षक बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए आते रहते हैं।

खास बात यह कि यहां तबला सम्राट के जीवन और संगीत यात्रा के अनछुए पहलुओं से रूबरू कराने के लिए साहित्य के साथ ही कई महत्वपूर्ण तस्वीरें भी रखी गई हैं। तबला वादन और तबला सम्राट के बारे में जानकारी के लिए विदेशी पर्यटक भी आए दिन यहां आते रहते हैं। 
 

किशन महाराज की कायल थी दुनिया 

तबला सम्राट किशन महाराज और पूरण महाराज - फोटो : अमर उजाला
तबला सम्राट किशन महाराज ने तबले की थाप से संगीत की दुनिया में एक अलग ही मुकाम स्थापित किया है। तबले की आरंभिक यात्रा के कुछ साल बाद ही उस्ताद फैय्याजखान, पंडित ओंकार ठाकुर, उस्ताद बड़े गुलाम अलीखान, पंडित भीमसेन जोशी, वसंत राय, पंडित रविशंकर, उस्ताद अली अकबर खान जैसे बड़े कलाकारों के साथ संगत की।

नृत्य की दुनिया के महान हस्ताक्षर शंभु महाराज, सितारा देवी, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में भी उन्होंने तबले पर संगत की। किशन महाराज का जन्म कबीरचौरा मुहल्ले में 1923 में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ।

कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात को जन्म होने के कारण उनका नाम किशन पड़ा। उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्षों में पिता पंडित हरिमहाराज से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। पिता के देहांत के बाद उनके चाचा एवं पंडित बलदेव सहाय के शिष्य पंडित कंठे महाराज ने उनकी शिक्षा-दीक्षा का कार्यभार संभाला।

आज के आईने में देखा जिंदगी को
किशन महाराज का जिंदगी जीने का अंदाज़ बहुत बिंदास रहा। जो बनारसी पन से ओतप्रोत था। उन्होंने जिंदगी को हमेशा आज के आईने में देखा और अपनी मर्जी के मुताबिक बिंदास जिया।

लुंगी कुर्ते में पूरे मुहल्ले की टहलान और पान की दुकान पर मित्रों के साथ जुटान ताजिंदगी उनका शगल बना रहा। मर्जी हुई तो भैरो सरदार को एक्के पर साथ बैठाया और घोड़ी को हांक दिया। तबीयत में आया तो काइनेटिक होंडा में किक मारी और पूरे शहर का चक्कर मार आए।
 
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मैं कोई उलझन या दुविधा नहीं पालता

पं. पूरण महाराज - फोटो : अमर उजाला

किशन महाराज को वर्ष 2002 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें वर्ष1973 में पद्मश्री, वर्ष 1984 में केंद्रीय संगीत नाटक पुरस्कार, वर्ष 1986 में उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार, दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार और तालविलास के अलावा उत्तरप्रदेश रत्न, उत्तरप्रदेश गौरव भोजपुरी रत्न, भागीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान से भी नवाजा गया।

पं. पूरण महाराज ने बताया कि उनकी दिनचर्या पूजा पाठ, टहलना, रियाज, अपने शौक पूरे करना, मित्रों से गप्पे मारना था। यह सब ज़िंदगी की आखिरी घड़ी तक जारी रहा। वे बड़ी बेबाकी से कहते थे कि मैं कोई उलझन या दुविधा नहीं पालता बल्कि उसे जल्दी से जल्दी दूर कर देता हूं।

ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी। साठ साल पहले शेविंग के दौरान मूंछें सेट करने में एक तरफ छोटी तो दूसरी तरफ बड़ी हो जाने की दिक्कत महसूस की तो झट से उसे पूरी तरह साफ करा दिया।

इसके बाद फिर कभी मूंछ रखने की जहमत नहीं उठाई। उनकी दिनचर्या बड़ी नियमित थी। प्रातऱ् छह बजे तक उठ जाते थे। बगीचे की सफाई, चिड़ियों को दाना पानी और फिर टहलने निकल जाते थे।
 
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