मेले-उत्सवों के रंग परंपराओं की नगरी काशी के शृंगार हैं। रथयात्रा के बाद नाटी इमली का भरत मिलाप, चेतगंज की नक्कटैया और तुलसी घाट की नाग नथैया भक्ति भाव पर आधारित काशी के लक्खा मेले के रूप में विख्यात हैं।
इसी कड़ी में पिछले एक दशक में प्राचीन नगरी के सबसे बड़े दीपोत्सव देवदीपावली ने भी अब पांचवें लक्खा मेले का रूप ले लिया है। देवदीपावली अब विश्व समुदाय के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है। इस बार भी सात समंदर पार से हजारों की तादाद में सैलानी इस दीपोत्सव के साक्षी बनेंगे।
देव दीपावली निहारने के लिए दुनिया के कोने-कोने से विदेशी सैलानी काशी पहुंचेंगे। इसके लिए होटलों, धर्मशालाओं में जगह पक्की की जा रही है।
देव दीपावली कार्तिक में मास पर्यंत चलने वाले उत्सवों का चरमोत्कर्ष है।
जब गंगा के घाटों से लेकर कुंडों, सरोवरों और पेड़ों पर तक दीपमालाओं की लड़ियां जगमगा उठती हैं। देव दीपावली भी काशी के अन्य पर्व-त्योहारों की तरह संदेशपरक महोत्सव के रूप में विख्यात हो चला है।
विश्व सुंदरी पुल के पास मदरवा, सामने घाट से लेकर गंगा-वरुणा संगम (सराय मोहाना) तक घाट-घाट पर लोगों के सपने दीयों में सजेंगे। कहीं पीएम नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन का संदेश होगा तो कहीं डिजिटल इंडिया और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का संदेश दीपमालाओं में उकेरा जाएगा।
आतंकवाद के अलावा देवी-देवताओं, राष्ट्रीय परिदृश्यों पर आधारित दीपों की अल्पनाएं यादगार बनेंगी। 100 से अधिक घाटों पर दीपदान होगा।