हिंदी भाषा के मानकों को तय करने वाली ऐतिहासिक संस्था नागरी प्रचारिणी सभा पर पांच दशकों से चला आ रहा पारिवारिक वर्चस्व टूट गया है। इस बार हिंदी के जाने-माने लेखक, कवि, रंगकर्मी/निर्देशक व्योमेश शुक्ल की अगुवाई वाला गुट विजयी हुआ है। इससे पहले 70 के दशक से डॉ सुधाकर पांडेय के परिवार का वर्चस्व था। पहली बार उनके परिवार से हटकर कार्यकारिणी चुनी गई है
मतगणना की रिटर्निंग ऑफिसर एसडीएम पिंडरा अंशिका दीक्षित ने निर्वाचित पदाधिकारियों की सूची जारी की। नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि संस्था के पुनरुद्धार व सर्वांगीण विकास के लिए कृत संकल्पित हैं। संसार में हिंदी के सबसे बड़े पुस्तकालय ‘आर्यभाषा पुस्तकालय’ का जीर्णोद्धार कराना है। इसके साथ ही साहित्यकारों-शोधार्थियों और हिंदी छात्रों के लिए संस्था के दरवाजे खोलने का अभियान शुरू करेंगे। सभा की पांडुलिपियों का डिजिटाइजेशन, हेरिटेज इमारत का संरक्षण और आधुनिकीकरण, बड़े साहित्य उत्सव का आयोजन, ऑडिटोरियम और कॉन्फ्रेंस हॉल का निर्माण, गेस्ट हाउस एवं कैफेटेरिया का निर्माण कराना प्रमुख है। पुस्तक मेले और पांडुलिपियों के मेले के साथ ही प्रकाशन प्रकल्प को पुन: शुरू कराया जाएगा। सभा को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की तरह विकसित करने की योजना है।
परिवार की बन गई थी जागीर
नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री व्यामेश शुक्ल ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा जैसी गौरवशाली संस्था का दुर्भाग्य है कि देश को आजादी मिलने के दो दशक बाद से ही यह संस्था हिंदी पढ़ने-पढ़ाने वालों से कटकर एक परिवार की व्यक्तिगत जागीर बनती चली गई। सन् 1969 में डीएवी इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य एवं कांग्रेस के पूर्व सांसद (चंदौली लोकसभा 1971-77, राज्यसभा 1980-86 ) सुधाकर पांडेय इसके प्रधानमंत्री बने और तबसे लेकर सन् 2003 तक वह इस पद पर आसीन रहे। उनकी मृत्यु के तत्पश्चात उनके बेटे डॉ. पद्माकर पांडेय ने इस पद को पारिवारिक गद्दी की तरह हथिया लिया। सन् 2021 में अपनी मृत्यु तक वह भी इस पद पर आसीन रहे। इसके बाद उनके छोटे भाई डॉ. कुसुमाकर पांडेय कागजों में इस संस्था के प्रधानमंत्री बन गए।
नागरी लिपि व हिंदी भाषा के प्रसार के लिए हुई थी स्थापना
हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रसार के लिए उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में तीन युवा साथियों ने बनारस के क्वींस कॉलेज में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की। बाबू श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह तीनों साथियों ने इस सभा के स्थापना की तिथि 16 जुलाई 1893 निर्धारित की। सभा का उद्देश्य था नागरी लिपि व हिंदी भाषा का राष्ट्रव्यापी प्रसार।
स्वतंत्रता आंदोलन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान इस संस्था का भाषा के जरिये देश को एक सूत्र में पिरोने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस संस्था ने राष्ट्रीय चेतना की अलख जगायी. स्वतंत्रता अभियान से जुड़े नायकों में रमेशचंद्र दत्त, बालगंगाधर तिलक, आशुतोष मुख़र्जी, तेजबहादुर सप्रू, गोविंदवल्लभ पंत, सी. वाई. चिंतामणि, सर सुंदरलाल, महात्मा गांधी व मोतीलाल नेहरु जैसी शख्सियतों ने भी इस संस्था का सहयोग किया तथा इसमें योगदान दिया।