वाराणसी के बभनियाव में चल रही खुदाई के बाद शैव धर्म की प्रधानता पर पुरातत्व विभाग की भी मुहर लग गई। पुरातत्वविदों का मानना है कि इससे पंचक्रोशी परिक्रमा के अस्तित्व को भी वैज्ञानिक आधार मिलेगा। पुराणों में जो उल्लेख है उसका वैज्ञानिक आधार मिलने से भारतीय के प्राचीन धर्म, संस्कृति और परंपरा को वैश्विक रूप से प्रमाणित करने में भी मदद मिलेगी। रविवार को हुई खुदाई में मिला स्थापित एकमुखी शिवलिंग अपने पूर्ण आकार में सभी के सामने आया।
बीएचयू के आर्कियोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ओएन सिंह और डायरेक्टर डॉ. अशोक कुमार सिंह की देखरेख में खुदाई जारी रही। डायरेक्टर डॉ. अशोक सिंह ने बताया कि पहली बार खनन में पूर्णरूप से स्थापित शिवलिंग प्राप्त हुआ है। यह गुप्तकाल के शुरुआती समय का शिवलिंग है। वहीं खुदाई क्षेत्र के सौ मीटर पश्चिम में चल रहे काम के दौरान शुंग और कुषाण कालीन अवशेष निकले हैं।
इसमें बर्तनों के अलावा हड्डियों का मिलना यह साबित करता है कि यहां पर आबादी रही होगी। खुदाई में मिट्टी के कसोरे, लाल रंग के तसले, सुराहीदार गर्दन के बर्तन प्राप्त हुए हैं। बभनियांव में टीम ने 1.40 मीटर की गहराई में अभी तक खुदाई की है और अभी पांच मीटर नीचे तक खुदाई होना बाकी है। राजातालाब चौकी इंचार्ज भी रविवार को खुदाई स्थल पर पहुंचे और सुरक्षा के बारे में जानकारी ली।
खुदाई स्थल पर पहुंचे बीएचयू के प्रोफेसर मारुति नंदन तिवारी ने बताया कि महावन और बभनियाव में जो मूर्तियां मिली हैं वह दुर्लभ हैं। हनुमान जी की प्रतिमा बेहद दुर्लभ है जो आठवीं और नौवीं शताब्दी की हैं। प्रतीत होता है कि यहां पर शैव या शाक्त परंपरा का मंदिर रहा होगा।