जिय बिनु देह नदी बिनु बारी/तैसिअ नाथ पुरुष बिन नारी/नाहिं तो मोर मरनु परिनामा/कछु न बसाइ भएं बिधि बामा/अस कहि मुरुछि परा महि राऊ/राम लखन सिय आनि देखाऊ/राम बियोग बिकल सब ठाढ़े/जहं तहं मनहुं चित्र लिखि काढ़े...। अयोध्या के मैदान में शनिवार को रामनगर की राम लीला चिंतातुर सीता के समक्ष राम के पहुंचने के साथ शुरू हुई। सीता सोच में पड़ी हुई हैं। राम उनके पास आते हैं। भगवान राम सीता से कहते हैं कि यह समय सोच मेें बैठने का नहीं, वन चलने की तैयारी करो।
सीता अपनी सास कौशिल्या का पैर पकड़कर कहती हैं कि मैं कितनी अभागिन हूं कि जब सेवा करने का समय आया तब वन जाने की बारी आ गई। मां ने सीता को आशीर्वाद दिया। उधर, लक्ष्मण भी दौड़कर आते हैं और वह राम के साथ वन जाने की आज्ञा मांगने लगते हैं। दशरथ सीता को समझाते हैं कि तुम वन में कैसे रह सकोगी? तुम मत जाओ। वह संकुचाती हैं। तभी कैकेयी मुनियों का वस्त्र लाकर पटक देती हैं। कैकेयी राम की तरफ इशारा कर कहती हैं- तुम राजा के प्राण हो। तुम्हारा शील और स्नेह छोड़ने से वह डरते हैं। कैकेयी की यह वाणी दशरथ को वाण की तरह लगती है। दशरथ के मुंह से आह निकलती है।
वह कहते हैं कि अभागे प्राण न जाने क्यों नहीं निकल जा रहे हैं। राम मुनि वेश में राज महल से निकल पड़ते हैं। वशिष्ठ जी के पास पहुंचकर राम लोगों को समझाते हैं। कहते हैं कि आप सभी महाराज की सेवा करें। हम शीघ्र ही आएंगे। राम वन की ओर निकलते हैं और दूसरी ओर लंकापति को बुरे स्वप्न आने लगते हैं। देवता खुश होकर पुष्पवर्षा करने लगते हैं। सुमंत रथ लेकर आते हैं। राम से कहते हैं कि रथ से चलिए लेकिन वह उन्हें वापस कर देते हैं। पहले दिन राम, लक्ष्मण, सीता शृंगवेरपुर में तमसा नदी के किनारे निवास करते हैं। निषादराज राम की सेवा में जुट जाते हैं।