शिया समुदाय की सबसे बड़ी खुशी ईद-ए-गदीर 25 जून को मनाई जाएगी। इस दौरान गंगा के तट पर करारा हाउस मुकीमगंज में 150 साल पुरानी
ईद-ए-गदीर की महफिल सजेगी। वहीं, शिया बाहुल्य इलाकों में नमाज, अमाल और महफिलों का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा।
हजरत अली समिति के सचिव हाजी सैयद फरमान हैदर ने बताया कि इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने जिलहिज्जा की 18वीं तारीख को ईद-ए-गदीर मनाई जाती है। शिया हजरात इसे ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा से भी बढ़कर महत्व देते हैं। 1435 साल पहले नबी हजरत मोहम्मद ने हज से लौटते समय मक्का और मदीना के बीच गदीर नामक स्थान पर सवा लाख हाजियों के बीच घोषणा की कि जिस-जिसका मैं मौला हूं, उस उसके अली भी मौला हैं। अली मेरे जानशीन हैं। तीन दिनों तक सवा लाख लोग हजरत अली को बधाई देते रहे।
बनारस में भी शिया समुदाय जोश-खरोश से ईद-ए-गदीर मनाएगा। शिया बाहुल्य इलाकों में सुबह से ही नमाज, अमाल और महफिलों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। पत्थरगली में शहीद अली के निवास पर महफिल का आयोजन होगा। शायरों को इनाम दिया जाएगा। साथ ही शिरकत करने वालों को लकी ड्रॉ के जरिए इनाम से नवाजा जाएगा। भदऊं पर स्वर्गीय आले हसन के इमामबाड़े पर नसीरूल मेंहदी के संयोजन में सुबह नौ बजे महफिल सजेगी। मुख्य कार्यक्रम गंगा किनारे करारा हाउस मुकीमगंज में शाम चार बजे मौलाना जफरुल हुसैनी के संयोजन में कदीमी 150 साल पुरानी महफिल आयोजित होगी। यहां हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं। खुशियों का सिलसिला 24 जून की रात से शुरू होकर 27 जून तक चलेगा।