एक सदी पहले ‘प्रिंस ऑफ बेगर्स’ महामना ने दान की बाती से शिक्षा का जो दीपक जलाया था, आज वह ज्ञान की अलख बन गया है। भारतरत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने शिक्षा के विस्तार और प्रसार के लिए जो सपना देखा, अपने संकल्प और इच्छाशक्ति से उन्होंने इसे सच कर दिखाया। उनके दान की बाती आज काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में जानी जाती है। ये शिक्षा संस्थान वैदिक शिक्षा से लेकर आधुनिक तकनीकी ज्ञान का अद्भुत और अभूतपूर्व केंद्र ही नहीं बन गया है, आधुनिक चरक से लेकर कौटिल्य और नास्त्रेदमस से लेकर महान संगीतज्ञ तानसेन तक के निर्माण में निरंतर लगा हुआ है। महामना की इस बगिया से ज्ञान अर्जित कर प्रतिभाएं देश-दुनिया में काशी को गौरवान्वित कर रही हैं।
बीएचयू माने एक ऐसी जगह, जहां पुरातन शिक्षा का सर्वथा सम्मान है, तो आधुनिक पद्धति के प्रति पूरी विनम्रता। यहां की व्यावहारिक और बेजोड़ शिक्षा नीति का ही परिणाम है कि इसे एशिया के ख्यातिलब्ध और अग्रणी संस्थानों में भी गिना जाता है। बीएचयू सौ बसंत देख चुका है। इस शिक्षा संस्थान को लेकर अनगिनत स्मृतियां हैं, जिनमें काफी-कुछ तो कागजों पर दर्ज हैं लेकिन तमाम अलिखित तथ्य इसके शैशवकाल से युवा होने तक की यात्रा में छिपे हुए हैं। शताब्दी वर्ष उत्सव में हम समग्र शिक्षा की सोच के सफर पर महामना का मिशन नामक सीरीज शुरू कर रहे हैं। इसके तहत अमर उजाला हर शुक्रवार को इस संस्थान से जुड़ी नई जानकारियों से आपको रूबरू कराएगा।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय देश का पहला विश्वविद्यालय है, जहां ग्लास टेक्नालॉजी, फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री, इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री, माइनिंग, मेटलर्जी, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा की शुरुआत सबसे पहले हुई। आयुर्वेद, संगीत और संस्कृत जैसे विषयों के जरिये उच्चस्तरीय शिक्षा को आगे बढ़ाने का श्रेय भी इसी विश्वविद्यालय को है। यही नहीं, ये देश का इकलौता विश्वविद्यालय हैं जहां नर्सरी से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई होती है। यही वजह है कि इसे ‘सर्वविद्या की राजधानी’ की उपाधि मिली हुई है।
100 साल पहले 4 फरवरी, 1916 बसंत पंचमी के दिन महामना ने इस सर्वविद्या की राजधानी की आधारशिला रखी थी। बीएचयू की स्थापना के करीब चार साल बाद ही राष्ट्र निर्माण में तकनीकी की उपयोगिता को समझते हुए ही महामना ने यहां इंजीनियरिंग कॉलेज की शुरुआत की। पहले कॉलेज, फिर आईटी और फिर इसे आईआईटी का दर्जा मिला। ऐसे ही छह संस्थान, आठ संकाय और 140 विभागों से अधिक विभाग इस विश्वविद्यालय में हैं। यूं तो देश भर में तमाम मेडिकल कॉलेज हैं लेकिन बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आईएमएस) की देश भर में अलग पहचान हैं जिसकी शुरुआत तो सुश्रुत के आयुर्वेद कॉलेज से हुई लेकिन आज मॉडर्न मेडिसिन से लेकर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस सर सुंदरलाल अस्पताल, ट्रॉमा सेंटर इसकी पहचान बन गए हैं। स्टेम सेल एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेंटर की सौगात भी जल्द ही मिलने वाली है।
ये महामना का गहन चिंतन ही था कि उन्होंने बीएचयू को इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई से इतर ग्रह नक्षत्र और ज्योतिष विद्या के भी एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया। जो अहमियत उन्होेंने विज्ञान व तकनीकी को दी, वहीं अहमियत कृषि शिक्षा को दी। 500 एकड़ में कृषि विज्ञान संस्थान से लेकर कृषि फार्म और डेयरी फार्म भी इस विश्वविद्यालय की शान हैं। कला, दृश्य कला से लेकर संगीत एवं मंच कला को भी महामना ने महत्व दिया। 30 हजार से अधिक विद्यार्थियों, पांच हजार से अधिक शिक्षक और इतने ही कर्मचारियों का वास इस विश्वविद्यालय की विशालता को दर्शाता है।