गंगा-वरुणा के तट पर जलेगा 51 फीट ऊंचा रावण
विजयदशमी पर दो अक्तूबर को गंगा-वरुणा संगम के तट पर लाटभैरव रामलीला समिति की ओर से आयोजित रावण दहन न केवल भव्य होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देगा। 51 फीट ऊंचे रावण के साथ 45-45 फीट के कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले इको-फ्रेंडली सामग्री से तैयार किए गए हैं, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।
लाटभैरव रामलीला समिति ने इस बार प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। पुतलों में एक-एक हजार इको-फ्रेंडली बमों का उपयोग किया गया है। समिति के प्रधानमंत्री एडवोकेट कन्हैयालाल यादव ने बताया कि हमारा लक्ष्य भव्यता के साथ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के इन पुतलों को बनाने में अंबियां मंडी के एक मुस्लिम परिवार की चार पीढ़ियों की मेहनत शामिल है।
रामनगर में रावण को दी जाएगी मुखाग्नि
रामनगर की रामलीला में रावण का पुतला जलता तो है लेकिन यह हर जगह से अलग होता है। यहां रावण को हिंदू रिवाजों के अनुसार मुखाग्नि दी जाती है। श्रीराम के हाथों रावण के मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। चूंकि रावण के समूचे कुनबे में एकमात्र जीवित पुरुष सदस्य विभीषण ही बचे रहते हैं इसलिए हिंदू पारिवारिक संस्कारों के तहत वही रावण का अंतिम संस्कार करते हैं।
इस साल भी रामलीला मैदान में लगने वाले विजयादशमी मेले में 65 फीट ऊंचे और 30 फीट परिधि का विशालकाय रावण का पुतला आकर्षण का केंद्र होगा। पांच व्यक्ति आग देने वाले की अगुवाई में चिता के चारों ओर परिक्रमा करते हैं वैसे ही विभीषण यहां करते हैं। परिक्रमा के बाद वे रावण के पुतले को आग देते हैं। मुहूर्त के मुताबिक गुरुवार की रात रावण का अंतिम संस्कार किया जाएगा।
रामलीला का अनूठा संगम है बरेका की रामलीला
बरेका की अनूठी रामलीला का इतिहास 55 वर्ष पुराना है। यहां पर एक तरफ रामलीला पेशेवर कलाकार करते हैं, वहीं दूसरी तरफ मोनो एक्टिंग पर आधारित रूपक का भी आयोजन होता है। बरेका की रंगशाला में 1970 में स्व. राम विनायक सिंह तत्कालीन राजभाषा अधिकारी की देखरेख में शुरू हुई रामलीला में नारद मोह, रावण जन्म से लेकर लक्ष्मण शक्ति, कुंभकर्ण वध तक कि लीला को मंचित किया जाता रहा।
उसी समय से बरेका के केंद्रीय खेल मैदान पर रामचरित मानस की चौपाइयों पर आधारित राम वन गमन से लेकर रावण वध तक की लीला को रूपक के माध्यम से मोनो एक्टिंग पर बरेका के स्कूलों के बच्चे प्रस्तुत करते हैं। समिति के सचिव अविनाश सिंह बताते हैं कि संस्थापक सदस्यों में पं. राम प्रवेश तिवारी 23 वर्ष तक महामंत्री रहे। उसके बाद एसडी सिंह ने महामंत्री पद की जिम्मेदारी संभालते हुए रूपक को और रोचक बनाया।