शुद्ध पानी की अहमियत
बच्चे हो या बड़े, शुद्ध पानी मिलना सभी के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। पांच साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सबसे अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। बीएचयू अस्पताल के बाल रोग विभाग की ओपीडी में हर सप्ताह आने वाले बच्चों के साथ ही हाल में भर्ती 101 बच्चों पर एक अध्ययन किया गया, जिसमें पहले से कुपोषित, अतिकुपोषित और स्वस्थ बच्चों की जांच की गई। सभी बच्चों की उम्र पांच साल और उससे कम थी।
अध्ययन के परिणाम में पता चला कि सभी श्रेणियों के बच्चों के आंतों में सूजन के साथ ही एमपीओ लेवल मानक से अधिक था। बाल रोग विभाग के प्रो. सुनील राव के अनुसार बच्चों के स्टूल की जांच में यह स्थिति सामने आई। अभिभावकों से बातचीत और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर इसकी मुख्य वजह दूषित पानी पीना पाया गया।
जांच में सामने आए चौंकाने वाले परिणाम
- 61 बच्चे (अति कुपोषित श्रेणी) – एमपीओ लेवल 20,000 नैनोग्राम/ग्राम
- 25 बच्चे (कुपोषित श्रेणी) n एमपीओ लेवल 9,500 नैनोग्राम/ग्राम
- 15 बच्चे (स्वस्थ) – एमपीओ लेवल 8,250 नैनोग्राम/ग्राम
- (बाल रोग विशेषज्ञ प्रो. सुनील कुमार राव के अनुसार जिन बच्चों के आंतों में सूजन नहीं है, उनमें एमपीओ लेवल 2,000 नैनोग्राम/ग्राम से कम होना चाहिए।)
एमपीओ एक तरह का एंजाइम, इसका असर आंतों पर ही पड़ता है
एमपीओ यानी मायलो पैरोक्सीडेज एक एंजाइम होता है। यह एंजाइम बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक पदार्थों के कारण होने वाले संक्रमण से लड़ने में शरीर की रक्त कोशिकाओं की मदद कर प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर किसी के आंतों में सूजन या कोई संक्रमण है तो संबंधित मरीज के स्टूल यानी मल में इसकी मात्रा औसत से अधिक होती है। इसका असर सीधे तौर पर आंतों पर पड़ता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता कम इसलिए चपेट में आ रहे बच्चे
बड़ों की तुलना में तक पांच साल तक के बच्चों पर इसका अधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। ऐसा इसलिए बच्चों के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। ओपीडी में भी आंतों में सूजन वाले बच्चे अधिक आ रहे हैं। बड़ों में भी इस तरह की समस्या हो सकती है, इस पर भी अध्ययन करने की जरूरत है।