मदरसों के बच्चे अब कुर्ता पायजामा न पहनकर पैंट शर्ट में नजर आएंगे। इसके लिए जल्द ही प्रदेश सरकार ड्रेस कोड लागू करने जा रही है। राज्यमंत्री मोहसिन रजा के इस घोषणा से मदरसा प्रबंधन में खासी नाराजगी है। मदरसा शिक्षकों ने इस पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि सरकार का ये कदम उन्हें मंजूर नहीं है।
आल इंडिया टीचर्स एसोसिएशन के महामंत्री वहीदुल्लाह खां सईदी का कहना है कि ऐसे फैसले कर सरकार मदरसों को उनके परंपरागत शिक्षा और पुरानी संस्कृति से भटकाना चाहती है।
सरकार को सिर्फ मदरसों में ही क्यों संस्कृत विद्यालयों में भी ड्रेस लागू करना चाहिए क्योंकि संस्कृत और अरबी मदरसे दोनों परंपरागत शिक्षा की बुनियादी ढांचे को बरकरार रखने के लिए चलाए जाते हैं और सरकार की तरफ से इसलिए ही मान्यता दी जाती है।
सरकार का ये कदम भारत की संस्कृति को नष्ट करने का कदम है। वो ये भी कहते हैं कि मोहसिन रजा अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नहीं बल्कि वक्फ मंत्री हैं और मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से चलते हैं।
उधर, मदरसा रहमानिया के प्रधानाचार्य मौलाना अव्वल का कहना है कि जहां तक मदरसों में ड्रेस कोड लागू करने की बात है, ये तो सही है लेकिन ड्रेस कोड के नाम पर ये थोपना कि मदरसा छात्र पैंट शर्ट की पहनेंगे, ये गलत है। अगर ऐसा है कि तो सरकार को चाहिए कि पहले वो पार्लियामेंट व एसेंबली में पैंट शर्ट अनिवार्य कर दे। वहां लोग खादी कुर्ता और पायजामा क्यों पहनते हैं।
शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता सैयद फरमान हैदर का कहना है कि मदरसों के यूनिफार्म से ज्यादा जरूरी है कि मदरसों की शिक्षा गुणवत्ता की बात की जाए। मदरसा शिक्षकों के वेतन की बात की जाए। कुर्ता पायजामा मदरसों की पहचान रही है। इसे बदलना गलत है।