कॉलेज में ठकुराना परिसर का टैग सिर्फ प्रपंच था, असलियत तो कवियों का एक शिखर मंच था। संगीत समारोह की तरह रात के आठ बजे कवियों का सम्मेलन शुरू हुआ तो तड़के सुबह पांच ही समाप्त होता था। कविवर गोपालदास नीरज हर साल 25 नवंबर स्थापना दिवस पर पहुंचते थे।
एक बार बिजली कट गई तो अंधेरे का फायदा उठाकर रात के एक बजे तक मुख से पाठ करते रह गए। घुप अंधेरे में युवा दर्शक घंटा-डमरू बजा-बजाकर कविताएं सुनने का रस लेते। इसका जिक्र उन्होंने लाल किले की प्राचीर से भी की थी। कविता के बीच में कुछ घटनाएं भी घट जाती थीं, जिनकी चर्चा अगले वर्ष के कवि सम्मेलनों तक चलती थी। यहां का छात्र सिर्फ काव्य, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, संगीतज्ञ, खिलाड़ी, पुजारी ही नहीं घुड़सवारी का भी उस्ताद हुआ करता था। अब 25 साल बाद इन कवि सम्मेलनों की फिजा बदल गई।
बच्चन पांडेय का घर अपने आप में साहित्य का सागर हुआ करता था। काशी का तुलसी पुस्तकालय खामोश है और कर्माइकल पुस्तकालय कॉरिडोर के हिस्से चला गया। एकमात्र अर्दली बाजार का राजकीय पुस्तकालय में रखी किताबों में दीमक नहीं लगे हैं। नहीं तो अब बड़े-बड़े संकुलों में भारी शुल्क अदा करने में अक्षम नगर के साहित्यकार कहां जाते।
-डॉ. राम सुधार सिंह, साहित्यकार और पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, यूपी कॉलेज