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25 दिन- 25 कहानियां: ठकुराना परिसर के प्रपंच से पहले प्रेमचंद, नामवर सरीखे कवियों का मंच था यूपी कॉलेज

Thu, 14 May 2026 01:07 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: यूपी कॉलेज के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष और साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह ने कहा कि आज के कोरे कवियों में खुद को स्वयंभू घोषित करने की बेअकली है। इन्होंने वो शोर या दौर नहीं देखा जब गंगा आरती सरीखे शंख, डमरू, थाल, नगाड़ा और घंटा-घड़ियाल बजाकर काशी में रचनाओं का भी रसपान किया जाता था।
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डॉ. राम सुधार सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी कॉलेज में प्रस्तुति देने वाले प्रो. शिव मंगल सिंह सुमन की कविता वरदान नहीं मांगूगा... को उनके छात्र पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रार नहीं ठानूंगा... को विश्वप्रसिद्ध कर दिया था। आज के कोरे कवियों में खुद को स्वयंभू घोषित करने की बेअकली है। इन्होंने वो शोर नहीं देखा जब गंगा आरती सरीखे शंख, डमरू, थाल, नगाड़ा और घंटा-घड़ियाल बजाकर यूपी कॉलेज में रचनाओं का भी रसपान किया जाता था।

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आज हर गुरु का अपना अलग गुरुडम है। उनके अपने फिक्स चेले हैं। उनके समागम में उन्हीं की जय-जयकार है। आज के कोरे कवियों में खुद को स्वयंभू घोषित करने की बेअकली है। खैर इन्होंने वो शोर या दौर नहीं देखा जब गंगा आरती सरीखे शंख, डमरू, थाल, नगाड़ा और घंटा-घड़ियाल बजाकर काशी में रचनाओं का भी रसपान किया जाता था। एक्शन-अनुशासन के लिए अक्सर सुर्खियों में रहा भिनगाराज नरेश राजर्षि का उदय प्रताप कॉलेज कवि समागमों का नाभि हुआ करता था। यहां तपकर साबित करने वाला दुनिया के हर मंच पर जमकर ही लौटा था। गवाही आज के गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र और अशोक सिंह दे देेंगे।

वरदान नहीं मांगूगा के रचनाकर प्रो. शिव मंगल सिंह सुमन की कविताएं अक्सर यहीं सुनी जाती थीं। जिनकी इस कविता को आधार बनाकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रार नहीं ठानूंगा... को विश्व प्रसिद्ध कर दिया। तब ज्ञानपीठ अवाॅर्डी और यूपी काॅलेज के पूर्व छात्र केदारनाथ सिंह ने लिखा था मैं कविताओं के कीटाणुओं वाले कॉलेज में पढ़ता था, यदि यहां नहीं आता तो जीवन में कुछ भी बन जाता लेकिन कवि कभी न कहलाता।
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करीब 23 साल पुरानी बात है कि जिस बीएचयू ने नामवर सिंह को साहित्यकार बनाया उसी बगिया के विद्वानों ने राजनीतिक दिल दिखाकर उनका 75वां जन्म वर्ष मनाने से इन्कार कर दिया। फिर बाकी सभी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों ने हाथ खड़े कर दिए तो उदय प्रताप में नामवर के निमित्त शीर्षक से देश का सबसे बड़ा साहित्य सम्मेलन किया गया और देश का हर बड़ा साहित्यकार यहां हाजिरी लगाने आया। मुंशी प्रेमचंद और आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी यहां रचनाएं गढ़ा और सुनाया करते थे।

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कॉलेज में ठकुराना परिसर का टैग सिर्फ प्रपंच था, असलियत तो कवियों का एक शिखर मंच था। संगीत समारोह की तरह रात के आठ बजे कवियों का सम्मेलन शुरू हुआ तो तड़के सुबह पांच ही समाप्त होता था। कविवर गोपालदास नीरज हर साल 25 नवंबर स्थापना दिवस पर पहुंचते थे। 

एक बार बिजली कट गई तो अंधेरे का फायदा उठाकर रात के एक बजे तक मुख से पाठ करते रह गए। घुप अंधेरे में युवा दर्शक घंटा-डमरू बजा-बजाकर कविताएं सुनने का रस लेते। इसका जिक्र उन्होंने लाल किले की प्राचीर से भी की थी। कविता के बीच में कुछ घटनाएं भी घट जाती थीं, जिनकी चर्चा अगले वर्ष के कवि सम्मेलनों तक चलती थी। यहां का छात्र सिर्फ काव्य, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, संगीतज्ञ, खिलाड़ी, पुजारी ही नहीं घुड़सवारी का भी उस्ताद हुआ करता था। अब 25 साल बाद इन कवि सम्मेलनों की फिजा बदल गई। 

बच्चन पांडेय का घर अपने आप में साहित्य का सागर हुआ करता था। काशी का तुलसी पुस्तकालय खामोश है और कर्माइकल पुस्तकालय कॉरिडोर के हिस्से चला गया। एकमात्र अर्दली बाजार का राजकीय पुस्तकालय में रखी किताबों में दीमक नहीं लगे हैं। नहीं तो अब बड़े-बड़े संकुलों में भारी शुल्क अदा करने में अक्षम नगर के साहित्यकार कहां जाते।
-डॉ. राम सुधार सिंह, साहित्यकार और पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, यूपी कॉलेज 
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