ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि लोग मृत्यु से बचने का उपाय करते हैं परंतु हमें यह समझना चाहिए कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित रूप से होती ही है। इसलिए मृत्यु से कोई व्यक्ति नहीं बच सकता। हमें मृत्यु को संवारने का प्रयास करना चाहिए। यदि मृत्यु को संवार लेंगे तो मुक्ति प्राप्त हो जाएगी।
वह रविवार को केदार क्षेत्र के शंकराचार्य घाट पर स्थित श्रीविद्यामठ में कोरोना काल के मृतकों की सद्गति हेतु आयोजित मुक्ति कथा कह रहे थे। शंकराचार्य ने कहा कि जिस प्रकार किसी तरल पदार्थ को रखने के लिए बर्तन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार जीव भी किसी न किसी शरीर में रहता है। पानी बर्तन के अनुसार आकार धारण कर लेता है इसी प्रकार जीव भी जिस शरीर में जाता है उस अनुसार आकार धारण कर लेता है। शरीर को सांचे की तरह और मन को तरल पदार्थ की तरह से समझना चाहिए। कहा कि जब जन्म समाप्त होगा तो मृत्यु भी समाप्त हो जाएगी। हमें अपने जन्म को समाप्त करने की आवश्यकता है। जन्म समाप्त करने का उपाय है ज्ञान। ज्ञान की अग्नि से सभी प्रकार के कर्म नष्ट हो जाते हैं और जब कर्म नष्ट हो जाते हैं तो प्रारब्ध फल नहीं बनता। जब फल भोग नहीं रहता तो फिर जन्म भी नहीं होता। गे कहा कि हम अलग हैं और हमसे हमारा शरीर अलग है, इसे ठीक से जान लेना चाहिए। हम कभी नहीं जीते और मरते अपितु हमारा शरीर ही जीता और मरता रहता है। प्रवचन के पूर्व आचार्य वीरेश्वर दातार ने कलश पूजन व अन्य धार्मिक कृत्य संपादित कराए। पं. शिवचरित दुबे ने भागवत पारायण पाठ किया। पं. रास शुक्ल, पं. प्रशांत तिवारी, पं. नीलेश झा ने जप अनुष्ठान किया। गाजियाबाद के पं. अरविंद भारद्वाज ने शंकराचार्य की पादुका पूजन किया। श्रीमद्भागवत महापुराण की आरती व प्रसाद वितरण से कार्यक्रम का समापन हुआ।