वाराणसी के डीजल रेल इंजन कारखाना ने विश्व में पहली बार डीजल रेल इंजन को इलेक्ट्रिक रेल इंजन में बदलकर अपने स्वर्णिम इतिहास में एक और नया अध्याय जोड़ दिया है। मेक इन इंडिया पहल के अंतर्गत स्वदेशी तकनीक अपनाते हुए डीरेका ने डब्लूएजीसी 3 श्रेणी के रेल इंजन से शुरुआत की है।
ऐसा पहला रेल इंजन (संख्या-001) है जो 5000 अश्व शक्ति का है। ऐसे दो रेल इंजन जोड़कर रेल सेवा में उपयोग होगा जिसकी क्षमता 10000 अश्व शक्ति होगी। इसे ट्रायल के लिए आरडीएसओ (डीरेका अनुसंधान अभिकल्प तथा मानक संगठन) को भेजा जा रहा है।
कुछ दिन पहले 2600 अश्वशक्ति क्षमता के दो पुराने डीजल रेल इंजन डीरेका लाए गए थे जिनमें से एक के पावर बदलने का काम पूरा हो गया है। इस नए रेल इंजन की खास बात यह है कि यह एक साहसिक अवधारणा पर आधारित है जिसमें डब्ल्यूडीजी3, श्रेणी के दो डीजल इंजनों को एक स्थायी रूप से जोड़कर 12-एक्सल, 10000 अश्व शक्ति के विद्युत रेल इंजन में परिवर्तित किया गया है।
आरडीएसओ, चितरंजन रेल इंजन कारखाना, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) के इंजीनियरों की एक टीम ने मिलकर इस कार्य को पूर्ण किया।
कुछ दिन पहले सदस्य ट्रैक्शन रेलवे बोर्ड घनश्याम सिंह ने भी रेल इंजन को लेकर चल रहे कार्य का निरीक्षण किया था। उस दौरान डीरेका की महाप्रबंधक रश्मि गोयल भी रहीं।
दो महीने छह दिन में पूरा हुआ कार्य
इलेक्ट्रिक रेल इंजन और डीरेका के सदस्य
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इस पूरी कार्ययोजना के लिए संपूर्ण टीम ने लक्ष्य निर्धारित किया। यह निर्णय लिया गया कि केवल उन डीजल रेल इंजन का रूपांतरण किया जाएगा जो रेल को अपनी अधिकतम सेवा दे चुके हैं। ऐसे डीजल रेल इंजन के चेसिस, बोगी और ट्रैक्शन मोटर्स को बनाए रखा जाता है। साथ ही साथ डब्ल्यूएएम 4 श्रेणी के विद्युत रेल इंजन के साइड की दीवारें और निष्प्रयोज्य रेल इंजनों की छत का उपयोग किया जाता है।
दो महीने छह दिन में पूरा हुआ कार्य
22 दिसंबर 2017 से बेहद कम समय में निर्धारित लक्ष्य के अनुसार इस रेल इंजन को 28 फरवरी, 2018 को नया रूप प्रदान कर दिया गया। इस यूनिट की सुरक्षा और रेटिंग परीक्षण किया जाएगा। प्रोटोटाइप यूनिट में अन्य संभावित सुधारों के लिए जांच भी की जाएगी। दूसरी इकाई के लिए चेसिस के संशोधन का कार्य पहले ही शुरू हो चुका है।
फ्रेट कॉरिडोर के लिए भी उपयुक्त
इंजन का ट्रायल
देश में तैयार हो रहे फ्रेट कॉरिडोर में ऐसे शक्तिशाली रेल इंजनों का इस्तेमाल किया जाएगा। जहां 10000 क्षमता के रेल इंजन डबल डेकर बोगियों को खींचते नजर आएंगे। इसके अलावा मधेपुरा में भी ऐसे ही रेल इंजन तैयार हो रहे हैं जो कुछ-कुछ इसी तकनीक पर आधारित हैं।
एल्स्टम और भारतीय रेल के सहयोग से दो इंजनों को जोड़कर लगभग 12000 अश्वशक्ति क्षमता के रेल इंजन बन रहे हैं। डीरेका की इस पहल के बाद पुराने डीजल रेल इंजन को नया रूप दिया जा सकेगा।
इतना ही नहीं आने वाले दिनों में सभी ट्रैक का विद्युतीकरण होने के बाद डीजल रेल इंजन को जरूरत पड़ने पर इलेक्ट्रिक इंजन में बदलने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
डीरेका के उपमहाप्रबंधक नितिन मेहरोत्रा ने बताया कि अभी दो डीजल रेल इंजन में से एक को इलेक्ट्रिक में बदला गया है। ऐसे दो रेल इंजनों को जोड़कर 10000 अश्व शक्ति क्षमता का रेल इंजन तैयार होगा। फिलहाल यह टेस्टिंग में है। रेलवे बोर्ड से लक्ष्य मिलने के बाद और इंजनों को इलेक्ट्रिक में बदला जाएगा।