जिला जेल में दो अप्रैल को हुए बवाल के मामले में डीआईजी जेल एसके श्रीवास्तव ने भी जांच की थी। श्रीवास्तव ने अपनी जांच रिपोर्ट में पूरे जेल प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया था। 25 जून को आईजी जेल गोपाल गुप्ता को सौंपी जांच रिपोर्ट में उन्होंने तत्कालीन जेलर विजय राय और डिप्टी जेलर अजय कुमार को दोषी ठहराया था। दोनों जेल अधिकारियों को बंदियों से मिला हुआ बताया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी साजिश बैरक नंबर 12 और 13 में बंदी अजय यादव और राजेश यादव ने रची थी। घटना की न्यायिक जांच के आदेश उसी समय दे दिए गए थे। जानकारों की मानें तो न्यायिक अधिकारी ने जेल के घटनास्थल का मुआयना करने के साथ ही जेल अफसरों और बंदियों के बयान लिए थे।
डीआईजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जेल के कुछ अधिकारियों को इसकी जानकारी थी लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं तत्कालीन जेल अधीक्षक आशीष तिवारी को एलआईयू ने हमले की चेतावनी दी थी लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। बवाल के दौरान उनका गनर भी उनके साथ नहीं था। कैदियों ने बवाल कर तिवारी को सात घंटे तक बंधक बना कर रखा था। वे आशीष तिवारी को हटाने की मांग कर रहे थे। हटाने का आदेश जारी करने के बाद उन्हें मुक्त किया गया।
मामले में जेलकर्मियों व बंदियों को मिलाकर 20 से अधिक लोग घायल हुए थे। कैंट थाने में 15 बंदियों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज हुआ था। साजिश रचने के आरोपी दोनों बंदियों समेत सात को नैनी जेल स्थानांतरित कर दिया गया था। बाकी को अन्य जेलों में भेजा गया था। चार अप्रैल को जेल में फिर बवाल हुआ था। इस दौरान एक बैरक में आग लगाने की कोशिश की गई थी।
वहीं, दो अप्रैल को जेल अधीक्षक पर हमले एवं बवाल के मामले में नैनी कारागार से वारंट बी पर तलब कर भाजपा नेता गाजीपुर करंडा निवासी अरुण सिंह समेत 10 अन्य आरोपियों को शुक्रवार को अदालत में पेश किया गया और न्यायिक रिमांड बनाते हुए जेल भेज दिया।