यूनेस्को के क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में ‘संगीत के शहर’ के रूप में दर्ज हुए बनारस घराने के संगीत को नए पंख लगेंगे। दुनिया के लोग बनारस घराने के सुर-ताल आसानी से सीख सकेंगे। इसके लिए घाटों से लेकर गलियों तक संगीत के छोटे-छोटे गुरुकुल खोलने की योजना है। इसके लिए संगीत नाटक अकादमी ने संस्कृति विभाग को सुझाव दिया है। काशी में संगीत ग्राम खोलने की योजना को केंद्रीय पर्यटन विभाग की हरी झंडी मिलने के संकेत मिले हैं। जमीन की तलाश पूरी होते ही सा रे ग म... के स्वरों पर अलाप शुरू हो जाएंगे।
काशी में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर कभी जीने की राह दिखाने वाले संत कबीर-तुलसी का भक्ति संगीत निकला प्रस्फुटित हुआ था, वहां अब सुर, लय, ताल की अंगड़ाई दुनिया के लिए दीवानगी का हिस्सा बन गई है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के सुरों की बेजोड़ दमकशी हो या फिर पं. रविशंकर के सितार के तारों की मखमली चैनदारी। कथक क्वीन सितारा देवी की थिरकन हो या फिर तबला सम्राट पं. अनोखेलाल के ना धिं धिं ना...के ताल। बनारस में मशहूर हुए भारतीय शास्त्रीय संगीत के ऐसे फन को आगे बढ़ाने की योजना पर काम शुरू हो गया है।
संगीत नाटक अकादमी की सदस्य सचिव उषा आरके ने सुझाव दिया है कि बनारस घराने के संगीत को दुनिया भर के संगीत प्रेमियों से परिचित कराने के लिए छोटे-छोटे गुरुकुल खोले जाएं। घाटों, गलियों में ऐसे संगीत विद्यालय स्थापित हों, जहां विश्व भर से आने वाले पर्यटक संगीत की शिक्षा ले सकें। इस दिशा में काम करने वाली ठुमरी गायिका पद्मश्री सोमा घोष ने संगीत ग्राम की स्थापना के लिए योजना केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय को भेजी है। संगीत ग्राम का मॉडल भी तैयार हो गया है। जमीन की तलाश पूरी होते ही इसे खोल दिया जाएगा।