भक्ति और कर्म में विशेष अंतर नहीं है। प्रभु को प्रसन्न करने के लिए किया गया कर्म ही भक्ति है। उक्त बातें श्रीमद्भागवत कथा वाचक राघव ऋषि ने रविवार को डाफी के अशोकपुरम कॉलोनी में ज्ञान यज्ञ को संबोधित करते हुए कही। कथा के पांचवें दिन नंद महोत्सव में छप्पन भोग की झांकी का प्रसाद पाकर श्रद्धालु निहाल हुए।
कथा श्रवण कराते हुए कुछ राघव ऋषि ने कहा कि मां भगवती के द्वारा हमें जो कुछ भी प्राप्त हुआ है उसका सदुपयोग करना चाहिए। ज्ञान को जीवन में उतारने, सार्थक और निरर्थक ज्ञान के अंतर को समझने के लिए एक सद्गुरु की आवश्यकता होती है। सद्गुरु ही ज्ञान का परिमार्जन कर सही मार्ग दिखलाता है। जीव जब गर्भ में आता है उसी वक्त उसके आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु सभी नियति द्वारा निश्चित कर दिए जाते हैं। मनुष्य को भोग के पीछे नहीं भागना चाहिए, जहां भोग होता है वहां मोक्ष नहीं होता। देवाधिदेव महादेव ने कहा है कि महा त्रिपुरसुंदरी के पूजन से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। कथा के अंत में सुमेरु पीठाधीश्वर स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वती जी महाराज ने भी श्रद्धालुओं को आशीर्वचन दिया। इस मौके पर राजेंद्र गोयनका, शिवानंद पाठक, परमेश्वर लाल लोहिया, संजय शर्मा आदि मौजूद रहे।