वाराणसी। भगवान राम देवी को एक सौ आठ नीलकमल अर्पित करने का संकल्प लेते हैं लेकिन देवी चुपके से आकर आखिरी पुष्प चुरा ले जाती हैं। राम विचलित और स्तब्ध हैं। तभी उन्हें याद आता है कि उनकी आंखों को मां नीलकमल कहा करती थीं। वह अपना नेत्र अर्पित करने के लिए हाथों में तीर उठा लेते हैं। तभी देवी प्रकट होती हैं। वह राम को रोकती हैं, उन्हें आशीष देती हैं, उनकी अभ्यर्थना करती हैं और राम में अंतर्ध्यान हो जाती हैं।
शनिवार को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और रूपवाणी के प्रयास से राम की शक्तिपूजा शीर्षक नाटक का मंचन लोहटिया स्थित रूपवाणी के स्टूडियो थिएटर में संपन्न हुआ। राम-रावण युद्ध चल रहा है। युद्धरत राम निराश हैं और हार का अनुभव कर रहे हैं। उनकी सेना भी खिन्न है। प्रिया सीता की याद अवसाद को और घना बना रही है। बुजुर्ग उमंगित होना चाहते हैं लेकिन मनोबल ध्वस्त है। शक्ति भी रावण के साथ है। देवी स्वयं रावण की ओर से लड़ रही हैं राम ने उन्हें देख लिया है। वह मित्रों से कहते हैं कि विजय असंभव है और शोक में जामवंत उन्हें प्रेरित करते हैं, वह राम की आराधन-शक्ति का आह्वान करते हैं उन्हें सलाह देते हैं कि तुम सिद्ध होकर युद्ध में उतरो। राम ऐसा ही करते हैं। उधर लक्ष्मण, हनुमान आदि के नेतृत्व में घनघोर संग्राम जारी है, इधर राम की साधना चल रही है। राम की भूमिका स्वाति, सीता और देवी दुर्गा की भूमिका में नंदिनी, लक्ष्मण की भूमिका में साखी, हनुमान, विभीषण और जामवंत की भूमिका तापस, सुग्रीव और अंगद की भूमिका शाश्वत ने निभाई। संगीत जेपी शर्मा और आशीष मिश्र का रहा।