दो से पांच वर्ष बाद सामने आते हैं लक्षण
बच्चे के पैदा होने के दो से पांच साल बाद इसके लक्षण सामने आते हैं। इसमें हाथ-पैर और रीढ़ मुड़ने लगती है। मांस पेशियों के सिकुड़ने से फेफड़े काम नहीं करते। हार्ट अटैक या लंग्स फेलियर से 20 साल की उम्र तक मौत हो जाती है। बीएचयू में 3500 मरीजों के सैंपल हैं, लेकिन रिसर्च के लिए कोई मदद नहीं है। वहीं, यूपी में इन मरीजों को न तो मुफ्त फिजियोथेरेपी मिल रही और न ही कोई सरकारी सुविधा।
फिजियोथेरेपी एकमात्र उपाय
इन मरीजों को जिंदा रखने का एक मात्र उपाय फिजियोथेरेपी है। निजी केंद्रों पर एक बार का 300 रुपये चार्ज लगता है। हर महीने तो नौ हजार रुपये खर्च होता है। दवाओं का खर्च मिलाकर 15 से 20 हजार रुपये हर महीने खर्च होता है।
ऐसे होती है डीएमडी की पहचान
- - पैरों के नीचे की काफ मसल (घुटने के नीचे वाला हिस्सा) ठोस हो जाती है।
- - श्वांस में अनियमितता या फूलने की समस्या।
- - बच्चा जब जमीन पर हाथ या कोई दूसरा सहारा लेकर खड़ा हो।
- - उम्र बढ़ने के दौरान पीठ एक ओर मुड़ने लगती है।
बढ़ाने होंगे जागरूकता के प्रयास
वाराणसी के 200 डीएमडी रोगियों को रजिस्टर्ड करा चुके समाजसेवी जयंत सिंह कहते हैं कि देश भर में डेढ़ लाख मरीज हैं। हर साल 300 से ज्यादा मरीज पीजीआई में आ रहे हैं। बीएचयू ने आरटीआई में जवाब दिया कि 600 मरीज आते हैं। कुछ मरीज झाड़-फूंक कर सही कराने में लग जाते हैं। कुछ इसे पोलियो या लकवा मान लेते हैं। जागरूकता के प्रयासों को बढ़ाना होगा। यूपी में जाे भी प्रावधान है, वो 18 साल के बाद है।