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दामिनी दमके, चमकेरी, बिन बादरा आज की सांझ

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वाराणसी। राग मल्हार की धुन जब बिखरती है तो अंतर्मन को छू जाती है। अहसास ऐसा होता है कि सुनने वाला और सुनाने वाला प्रेम व विरह को स्वयं पर महसूस करते हैं। यह कुछ ऐसा ही है जैसे कि बरसात केसमय होता है। राग केदार में निबद्ध दामिनी दमके, चमके री, बिन बादरा आज की सांझ...। नायिका कह रही है कि बिजली चमक रही है और बादल भी गरज रहे हैं लेकिन बरसात नहीं हो रही है। ये राग प्रकृति के बेहद करीब ले जाते हैं। राग गौड़ मल्हार में निबद्ध बंदिश दादुरवा रे बोलाए रे बदरिया, घर जाईयो/ पिया बिना मोरा जिया लरजाए...के माध्यम से विरहिनी की व्यथा सुनाती हैं। वे कहती हैं कि दादुरवा के बोलने से बादल तो आ गए हैं और अब घर भी जाना है। पिया के बिना मेरा मन लरज रहा है। बारिश की तरह पिया का भी इंतजार रहता है। कुछ राग ऐसे भी होते हैं जो मल्हार से संबंधित तो नहीं होते लेकिन जब गाए जाते हैं तो वर्षा ऋतु का अहसास कराते हैं। गौड़ मल्हार में बलमा बहार आई, पिउ पिउ रटत पपिहरा, पिया के धुन सुनाए...। मेघ राग में निबद्ध रचना कजरा कारे कारे लागे अति प्यारे...। ये गीत कुछ ऐसा ही अहसास जगाते हैं। घटा छाई नभ मंडल, बरसे मूसलधार चहुंओर/बिजली चमके गरजे मेह। आकाश में काली घटा छाई हुई है और मूसलाधार बारिश हो रही है। बिजली भी चमक रही है और बादल गरज रहे हैं। ऐसे में गौड़ मल्हार की इस रचना में बरखा ऋतु का जो संगीत है वह मन को बेहद हर्षाता है। बादल की उमड़-घुमड़, बिजली की चमक, बारिश की रिमझिम फुहारें हर विरहिणी को सताती हैं। नायिका अपने प्रियतम के आने का इंतजार करती है। इनसेट अंबिका तिवारी उपशास्त्रीय एवं सुगम संगीत के क्षेत्र में सक्रिय हैं। संगीत की शिक्षा उन्होंने पं. नागेंद्र शर्मा से ली है। मूलत: बिहार की रहने वाली वर्तमान में पूरी तरह से काशी में ही बस गई हैं। रस भाव की प्रधानता होने के कारण बनारस घराने की कजरी, दादरा और ठुमरी इन्हें खास प्रिय है। अंबिका की कथक में भी रूचि है।
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