कब गिने जाते हैं दूसरी वरीयता के वोट
विधान परिषद चुनाव में मतदान के समय मतदाता उम्मीदवारों के नाम के सामने अपनी पसंद के अनुसार 1, 2, 3 अंक लिखते हैं। '1' उनकी पहली पसंद (फर्स्ट प्रेफरेंस) होती है, '2' दूसरी पसंद, और '3' तीसरी पसंद होती है।
सबसे पहले केवल पहली वरीयता (फर्स्ट प्रेफरेंस यानी '1') के वैध वोटों की गिनती होती है। चुनाव जीतने के लिए एक निश्चित कोटा (कुल वैध मतों का आधा हिस्सा + 1) हासिल करना जरूरी होता है। अगर पहली गिनती में ही किसी उम्मीदवार को जीत का निर्धारित कोटा मिल जाता है, तो वह तुरंत जीत जाता है।
अगर कोई भी उम्मीदवार पहली पसंद के वोटों से आवश्यक कोटा पूरा नहीं कर पाता है, तब दूसरी और अगली वरीयता के वोटों की गिनती शुरू होती है। ऐसी स्थिति में पहली वरीयता के सबसे कम वोट माने वाले उम्मीदवार को रेस से बाहर कर दिया जाता है।
इसके बाद बाहर किए गए उम्मीदवार के मतपत्रों को निकाला जाता है और यह देखा जाता है कि उन बैलेट पेपरों पर दूसरी वरीयता (2 नंबर) किस अन्य उम्मीदवार को दी गई है। उन मतपत्रों को उनकी दूसरी पसंद के आधार पर संबंधित उम्मीदवारों के खातों में ट्रांसफर (स्थानांतरित) कर दिया जाता है।
यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक कि कोई उम्मीदवार जरूरी कोटा पार करके जीत हासिल नहीं कर लेता। यही कारण है कि एमएलसी चुनाव में कई बार पहली पसंद में आगे रहने वाला उम्मीदवार भी हार सकता है, अगर उसके पक्ष में दूसरी या अगली वरीयता के पर्याप्त वोट ट्रांसफर न हों।