वाराणसी। महिलाओं के उत्पीड़न के मामले में पुलिस न तो सतर्क है न संवेदनशील। शिकायत मिलने पर पुलिस की पहली कोशिश मामले को दबाने की जाती है। लोकलाज का भय दिखाया जाता है। यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर आरोप लगा हो तो खुद पुलिस पैरोकार बन जाती है।
यही कारण है कि शहर की अधिकांश महिलाएं सुरक्षा के मामले में पुलिस पर भरोसा ही नहीं करती हैं। पुलिस का रवैया ऐसा है कि पीड़ित महिला को थानों में शिकायत करने में भी डर लगता है।
अमर उजाला के लिए हंसा रिसर्च की ओर से किए सर्वे में यह बात सामने आई है कि महज 22 फीसदी महिलाएं ही पुलिस की मौजूदा व्यवस्था में खुद को सुरक्षित समझती हैं जबकि 39 फीसदी महिलाओं के लिए पुलिस का होना न होना कोई मायने नहीं रखता है।
पुलिस के प्रति अविश्वास की स्थिति यूं हीं नहीं उत्पन्न हुई है। जंसा के परमंदापुर गांव की दो युवतियों के साथ युवकों ने छेड़छाड़ की और उनको एसएमएस से धमकियां भी देते रहे। इस मामले में 13 दिन की लड़ाई के बाद एसएसपी ने संज्ञान लिया और पास्को के तहत रिपोर्ट दर्ज हुई। उसके बाद भी थाने की पुलिस समझौता कराने का प्रयास करती रही।
मानवाधिकार एवं जन निगरानी समिति के डा. लेनिन के मुताबिक साल भर में उनके यहां घरेलू हिंसा से 70 मामले आए। ज्यादातर मामलों में पुलिस समझौता कराने में ही लगी रही। इसी तरह महिलाओं से छेड़छाड़ व उत्पीड़न के 60 मामलों में पुलिस रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करती रही