बनारस क्लब की सदस्यता से डॉ. एनपी सिंह के बाद मनीष श्रीवास्तव को भी निलंबित कर दिया गया। यह वही मनीष हैं जिन्हें डॉ. एनपी सिंह के समर्थन में तथाकथित बनारस क्लब विरोधी पर्चे बंटवाने के आरोप में शनिवार को पुलिस ने 12 घंटे तक बैठाए रखा था। अंतत: आरोप न साबित होने पर आधी रात बाद पुलिस ने मनीष को छोड़ दिया था।
क्लब के वार्षिक चुनाव के छह दिन पहले डॉ. सिंह और फिर मनीष की सदस्यता सस्पेंड करने का आला अफसरों का निर्णय मंगलवार को सामान्य सदस्यों के बीच चर्चा का विषय रहा। क्लब के सदस्य खुलेआम कुछ नहीं बोल रहे हैं क्योंकि कल उन्हीं अफसरों से उनका सामना होगा। मगर बातचीत के दौरान उनका कहना था कि अफसर ऐसा करके सवालों के घेरे में आ रहे हैं। ऐन चुनाव के समय ऐसी कार्रवाई कर अफसर क्लब में अपनी मुखालफत करने वालों की आवाज दबाकर अपने चहेतों को निर्वाचित कराना चाह रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो गबन का जिन्न अचानक बाहर न आता।
बनारस क्लब का चुनावी घमासान और अफसरों के चहेते व विरोधी खेमे की गुटबाजी पूरी तरह से सतह पर आ गई है। अधिकारियों के अनुसार डॉ. एनपी सिंह जब क्लब के सचिव थे तो साढ़े तीन लाख का गबन हुआ था। वहीं, क्लब के सामान्य सदस्यों का कहना है कि यदि किसी पदाधिकारी ने कोई गलत काम किया हो तो उस पर बेशक कार्रवाई हो लेकिन इस तरीके से न हो कि आमजन में उसका संदेश गलत जाए।
डॉ. एनपी सिंह क्लब के सचिव पद से तीन साल पहले हटे थे। तब से लेकर अब तक प्रशासनिक अधिकारी गबन नहीं पकड़ पाए और अचानक सब कुछ उनकी नजर में आ गया। इसके साथ ही आननफानन में जांच भी बैठा दी गई। यह इतना साबित करने के लिए पर्याप्त है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है और क्लब के चुनाव को लेकर अधिकारियों की मंशा साफ नहीं है। इन हालात में आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अधिकारियों के चहेते और विरोधी खेमे की अदावत का परिणाम क्या निकलता है।