वाराणसी। कलात्मक पत्थरों में शुमार चुनार बलुआ पत्थर को देश के बौद्धिक संपदा अधिकार में शामिल किया गया है। इसके साथ ही यह देश में नेचुरल गुड्स में दूसरा पंजीकृत जीआई (भौगोलिक संकेतक) उत्पाद है। यह जानकारी जीआई विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने सोमवार को दी। बताया कि अब इस बहुमूल्य पत्थर पर मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली जिले का कानूनी अधिकार है। अब यहीं से निकलने वाले पत्थर को ही चुनार बलुआ पत्थर कहा जाएगा।
डॉ. रजनीकांत ने बताया कि चुनार बलुआ पत्थर को जीआई उत्पाद के तौर पर पंजीकृत कराने के लिए 25 जुलाई 2016 को चेन्नई के जीआई कोर्ट में आवेदन किया गया था। दो साल आठ माह की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मार्च 2019 में चुनार बलुआ पत्थर को बौद्धिक संपदा का दर्जा मिला है। इसके साथ ही यह काशी क्षेत्र का 11वां जीआई पंजीकृत उत्पाद हो गया है और छह अन्य क्राफ्ट जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया चल रही है। इससे पहले बनारसी साड़ी और ब्रोकेड, भदोही कार्पेट, लकड़ी के खिलौने, मेटल रेपोजी, गुलाबी मीनाकारी, ग्लास बीड्स, ब्लैक पाटरी, गाजीपुर वाल हैंगिंग, सॉफ्ट स्टोन जाली क्राफ्ट, मिर्जापुर दरी जीआई पंजीकृत उत्पाद हैं। डॉ. रजनीकांत के अनुसार मौजूदा समय में देश के विभिन्न हिस्सों में 1000 शिल्पी चुनार के बलुआ पत्थर पर नक्काशी उकेरने का काम कर रहे हैं और इसका सालाना कारोबार लगभग 2000 करोड़ रुपये का है। सरकार के इस प्रयास से अब इस प्राकृतिक उत्पाद को सही मायने में संरक्षित किया जा सकेगा।
चुनार बलुआ पत्थर जितना ही पुराना होगा, उसमें मौजूद बलुआ कणों और उसके घनत्व के कारण उसकी चमक वायु घर्षण से बढ़ती जाएगी। इसके साथ ही पानी के अंदर सैकड़ों वर्षों तक रहने के बावजूद यह खराब नहीं होता है। विंध्य पर्वत माला और गंगा किनारे की विशिष्ट प्राकृतिक संरचना के कारण चुनार बलुआ पत्थर अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है।