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प्रदेश के विश्वविद्यालयों में 10 साल से नहीं हुआ कोर्ट का गठन

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प्रदेश भर के राज्य विश्वविद्यालयों में पिछले 10 साल से कोर्ट का गठन नहीं किया गया है। पंजीकृत स्नातक सूची से सदस्यों का निर्वाचन नहीं कराने के कारण कोर्ट का गठन नहीं हो पा रहा है।
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राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने कोर्ट सभा के गठन के लिए कुलाधिपति को पत्र लिखकर जल्द से जल्द राज्य विश्वविद्यालयों में कोर्ट सभा के गठन की मांग की है। पदाधिकारियों का कहना है कि कोर्ट के चार सदस्य कार्य परिषद में होते हैं जिसके कारण विश्वविद्यालय के अधिकारी अपनी मनमानी नहीं कर पाते हैं। कोर्ट सभा महत्वपूर्ण समिति होती है। जिससे पारित होकर सारा बजट वित्त समिति में जाता है। इसके बाद कार्य परिषद में जगह मिलेगी।
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के उच्च शिक्षा संवर्ग के प्रभारी डॉ. जगदीश सिंह दीक्षित ने बताया कि वर्तमान में किसी भी राज्य विश्वविद्यालय में कोर्ट (सभा) का विधिवत गठन नहीं किया गया है। वाराणसी के विश्वविद्यालयों सहित अधिकांश विश्वविद्यालय पंजीकृत स्नातकों की सूची से कोर्ट के सदस्यों का चुनाव ही नहीं कराते हैं। इस मामले में कुलाधिपति, मुख्यमंत्री एवं उच्च शिक्षा मंत्री राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की तरफ से पत्र भी दिया गया है।
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इनसेट
विश्वविद्यालय अधिनियम में है व्यवस्था
उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि प्रत्येक राज्य विश्वविद्यालय में एक कोर्ट (सभा) का गठन किया जाएगा। इसमें विश्वविद्यालय के कुलपति, कार्य परिषद के सदस्य एवं वित्त अधिकारी के अलावा अध्यापकों के प्रतिनिधि, विश्वविद्यालय एवं उसके संघटक महाविद्यालय एवं संस्थानों के छात्रावासों तथा वार्डन के दो-दो प्रतिनिधियों का चयन निर्धारित रीति से चक्रानुक्रम द्वारा किया जाता है। राज्य सरकार द्वारा पोषित संघटक महाविद्यालयों के सभी प्राचार्य, 15 अध्यापक जिनका चयन निर्धारित रीति से किया जाता है। संबद्ध या सहयुक्त महाविद्यालयों के प्रबंध तंत्र के दो प्रतिनिधि, सभी संकायों से एक-एक छात्र जो पिछली उपाधि में अधिकतम अंक प्राप्त किया हो। विधानसभा के पांच एवं विधान परिषद के दो सदस्य। इसके अलावा पंजीकृत स्नातकों की सूची से 15 सदस्यों का चुनाव कराने के बाद सभा के सदस्य होंगे। इस प्रकार सभी सभा के सदस्य मिलकर कार्य परिषद के लिए चार सदस्यों का चुनाव करते हैं।
नीति निर्धारण में करती है योगदान
सभा एक सलाहकारी निकाय होती है। यह सभा विश्वविद्यालय के नीति निर्धारण में अपना विशिष्ट योगदान तो करती ही है साथ ही विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक लेखा तथा उन पर आडिट रिपोर्ट पर विचार कर संकल्प भी पारित करती है। अन्य कार्यों में भी सभा अपना महत्वपूर्ण योगदान करती है।
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