उसके बाद उनके पुत्र बीएचयू के एजुकेशन फैकल्टी के पूर्व डीन और जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा बिहार के कुलपति हरिकेश सिंह ने शासन में इसकी शिकायत की। इस पर सीबीसीआईडी जांच हुई। जांच में दर्ज दोनों मामले गलत पाए गए जिस पर सीबीसीआईडी ने थानाध्यक्ष मरदह एमए काजी, पुलिस कर्मियों एवं घरिहां के पारसनाथ सिंह सहित 15 लोगों के विरुद्ध विभिन्न धाराओं मुकदमा पंजीकृत कराया।
आरोप पत्र न्यायालय में आने के बाद विचारण कर न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 30 अक्तूबर 14 को सभी आरोपियों को दोष मुक्त कर दिया। बाद में हरिकेश सिंह की ओर से निर्णय के विरुद्ध सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील की गई थी।
अभियोजन पक्ष की ओर से अधिवक्ता संजय कुमार राय और बचाव पक्ष के अधिवक्ता को सुनने के बाद अपर सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम की अदालत ने गुरुवार को सभी धाराओं में एमए काजी और कांस्टेबल श्याम नारायण सिंह को तथा घरिहां गांव के पारसनाथ सिंह, सुरेश सिंह और पीयूषकांत सिंह को दोषी माना। शुक्रवार को सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि इस कृत्य से समाज में गलत संदेश गया है। अभियुक्तगण दया के पात्र नहीं हैं।
एमके काजी और श्यामनारायण सिंह को सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास तथा दोनों को अलग-अलग एक लाख दो हजार के अर्थदंड की सजा सुनाई। वहीं घरिहां गांव के अभियुक्तों को सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास के साथ ही प्रत्येक को पैंतीस-पैंतीस हजार का जुर्माना लगाया गया।