बता दें कि सहारनपुर की जीआर ट्रेडिंग और सचिन मेडिकोज ने तस्करों का बड़ा नेटवर्क तैयार कर लिया था। 2021 में जब एसटीएफ वाराणसी और एनसीबी ने इसकी कमर तोड़नी शुरू की तो इस धंधे से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों ने नए नेटवर्क की जरूरत महसूस की। इसके लिए बेनकाब हो चुके चेहरों के अलावा नए नाम तलाशे गए। यूपी में सहारनपुर की बजाय गाजियाबाद को भंडारण का ठिकाना बनाया गया।
गाजियाबाद के नेटवर्क की जिम्मेदारी आसिफ-वसीम ने संभाली और पूर्वांचल की जिम्मेदारी शुभम को सौंपी गई। बाद में आसिफ दुबई चला गया और शुभम को यूपी, असम, झारखंड, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों की जिम्मेदारी सौंप दी गई। वसीम पश्चिम बंगाल का नेटवर्क संभालने में लग गया।
सूत्र बताते हैं कि बल्क खरीदारी में कंपनी से लगभग 174 रुपये की पड़ने वाली सिरप भारत में 300 और बांग्लादेश नेपाल में 500 से 600 रुपये में बिकने लगी। ज्यादा से ज्यादा सिरप की तस्करी की जा सके इसके लिए पूर्वांचल के लगभग हर जनपद में नई फर्में बनाई गईं। बोर्ड-बैनर ऐसी जगहों पर टांगे गए जहां कम से कम लोगों की नजर पड़े। पूर्व में जिनके लाइसेंस निरस्त किए जा चुके थे उनके नाम पर भी आपूर्ति बिल जारी किए गए।
दिलचस्प मसला यह है कि 2021 में नशीले सिरप तस्करी के एक बड़े नेटवर्क के खुलासे के बाद भी नए फर्मों पर लिए जा रहे लाइसेंस का किस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है, इसे जांचने की जरूरत तक नहीं समझी गई। ऐसा कुछ न होने की एक रिपोर्ट भी उच्चाधिकारियों को भेजे जाने की बात कई दिनों तक चर्चा में बनी रही। सोनभद्र में भी दो फर्जी फर्में तब पकड़ में आईं जब एसआईटी ने इनकी भूमिका पर सवाल उठाए।