प्रशासनिक लापरवाही और अदूरदर्शिता के चलते वरुणा के अस्तित्व को बचाना बड़ी चुनौती बन गई है। अफसरों की कुंभकर्णी नींद का नतीजा रहा कि वरुणा किनारे ग्रीन बेल्ट में मनमाने ढंग से निर्माण होता रहा और शिकायत पर भी कार्रवाई के बजाय लीपापोती ही की जाती रही। अब जब सीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘वरुणा कॉरिडोर’ के के तहत नदी की गहराई बढ़ाने और दोनों किनारों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की मुहिम चल रही है तो हायतौबा मच गई है। वजह, बेतहाशा अवैध निर्माण। कई जगह तो ऐसा है कि नदी किनारे पर ड्रेजिंग करने के लिए जगह ही नहीं बची है। आश्चर्य यह है कि राजस्व विभाग और वीडीए अब भी अवैध निर्माणों को लेकर गंभीर नहीं हैं। अलबत्ता, पैमाइश के जरिये नदी के दायरे में उलटफेर कर अवैध निर्माणों का वैध करने का नया खेल शुरू कर दिया गया है।
कैंटोनमेंट से लेकर सरायमोहाना स्थित गंगा-वरुणा संगम तक नदी के ग्रीन बेल्ट में निर्माण शुरू हुआ तो इसका सिलसिला अब तक नहीं थमा है। सिंचाई विभाग, वाराणसी विकास प्राधिकरण और नगर निगम में से किसी ने भी अवैध निर्माणों पर नजर नहीं दौड़ाई। नतीजतन वरुणा किनारे ग्रीन बेल्ट का पूरे इलाके में कंक्रीट का जाल फैल गया। महामना मालवीय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालाजी फार द गंगा मैनेजमेंट के अध्यक्ष प्रो. यूके चौधरी का कहना है कि नदी के जल क्षेत्र की जितनी चौड़ाई होती है कम से कम उसकी दोगुनी जमीन दोनों किनारों पर होनी चाहिए। इसे नदी का बाढ़ क्षेत्र या नदी का पेटा भी कहते हैं। वर्तमान में स्थिति यह है कि वरुणा का बाढ़ क्षेत्र छोड़िए, जो वास्तविक जल क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं रह गया है।