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कहंवा से आवे रामा कारी हो बदरिया कहंवा से आवे अंधियरिया ना...

Thu, 21 Jul 2016 02:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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सावन की फुहारें नया एहसास लेकर आ गई हैं। इसी के साथ मानसून मल्हार के रागों का सफर पूरा हो गया। तो अब कजरी की बहार में  झूमने के लिए तैयार हो जाइए। कजरी मुरझाए दिलों में बहार लेकर उतरती है, तो जीवन सौ रंग हो जाता है। बाहर से भीतर तक झूले पड़ जाते हैं। बरखा का पानी ओरिया से बहकर दुआर पर झरने लगता है तो बच्चों की कागज की नाव डूबने, उतराने लगती है। जानी-मानी लोक गायिका शारदा सिन्हा कहती हैं कि पूर्वांचल से मिथिलांचल तक लोक गीतों की परंपरा सावन, भादों से तर-ब-तर मिलती है। कजरी, आल्हा, झूला, मलार जीवन के रस-रंग बन जाते हैं। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत पर आधारित सावन में संगीत के सुखद एहसास।
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पटना से बैदा बोलाय दा हो नजरा गइनीं गोइयां या फिर उजर बगुल बिन पिपरो न सोहै कोयल बिनु बगिया ना सोहे राजा... जैसे लोकप्रिय गीतों की मल्लिका शारदा सिन्हा सावन को प्रकृति का सबसे बड़ा उपहार मानती हैं। वह कहती हैं कि गांवों में ननद-भौजाइयां मेहंदी से हथेलियां लाल करने लगती हैं। कहा जाता है हथेली जितनी लाल होगी, प्रियतम उतना ही प्यार करेंगे। चौमासा, बारहमासा, झूला गाकर महिलाएं  खुशी भी जाहिर करती हैं और पिया की याद भी। वह बनारस की मशहूर कजरी पर सुर लगाती हैं- पिया चलि गइलें रंगून हो/ कचौड़ी गली सून कइला बलमू...। वह बताती हैं कि कभी शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्ला खां इस धुन को बजाते थे, तब सावन का विरह बरबस सताने लगता था। गांवों में अब भी पारंपरिक कजरी होती है-सखि हे श्याम नहीं घर आए बदरा घिर घिर आए ना... राह तकत मोरा नैना पिराइल/ बटिया जोहत ना... रे सखि बटिया जोहत ना...।


प्रियतम परदेस होते हैं तब बादल के गरजने, बरसने से नायिका को डर लगने लगता है लेकिन अब सावन के गीतों में बदलाव आने लगा है। इस दौर में पति कमाने के लिए कलकत्ता या रंगून जा पाएंगे, यह जरूरी नहीं। अब तो कहीं काम ही नहीं मिल रहा है, बेरोजगारी विरह के भावों पर डाका डालने लगी है। फिर भी सावन तो आता ही रहेगा और इस तरह के गीत गाए ही जाते रहेंगे।  वह कहती हैं कि वर्षा की फुहार लेकर जब सावन, भादों का पानी बरसता है, तब भींगने की चाहत हो जाती है। मिथिलांचल में मुझे याद है जब मैं छोटी थी खेतों में धान की रोपनी के समय महिलाएं गीत गाती थीं। सावन के आइल महिनवां हो सखि गावा कजरिया/ कजरा लगाव नयनवां हो सखि गावा कजरिया...। शास्त्रीय रागों का मल्हार देसज में मलार हो जाता है। वह बताती हैं कि भोजपुरी में- देखि कारे से बदरवा डर लागे...सुनाई देता है तो अवधी में कजरी गाई जाती है- कहंवा से आवे रामा कारी हो बदरिया/कहंवा से आवे अंधियरिया ना...। यह लोक में प्रेम का गीत है। इस लोक गीत की शुरुआत ही सैंया, बलमा, पिया, हरे रामा से होती है। कजरी सावन भी है, प्रियतम की मनुहार भी।
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