महापंडित से लेकर निरक्षर तक के हाथों में आदर पाने वाले श्री रामचरित मानस के कुछ अंशों की रचना गंगा के जिस पावन तट पर हुई, उस पुण्य भूमि को बुधवार को नमन किया जाएगा। संत गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर वहां उस पोथी की पूजा होगी, जिसे उन्होंने15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लिखा था। संत की यहां बनी कुटिया अब मंदिर में तब्दील हो गई है। वहां एक तरफ अखाड़े में पहलवान भिड़ते हैं तो मंदिर में मानस के रचयिता की खड़ाऊं और नाव के अंश जैसी अमर निशानियों के दर्शन कर पर्यटक और श्रद्धालु धन्य हो जाते हैं।
तुलसी जयंती पर सिर्फ तुलसी घाट पर जयंती समारोह मनाया जाएगा। अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र के अनुसार शाम सात बजे मानस व्यास सम्मेलन होगा। इससे पहले तुलसी मंदिर में मानस पोथी की पूजा होगी। मंदिर में उस नाव के अंश को धरोहर के तौर पर सहेज कर रखा गया है, जिस पर गोस्वामी जी नौका विहार करते थे। दुर्गाकुंड स्थित तुलसी मानस मंदिर में भी संत तुलसी को याद करने के नाम पर रस्म अदायगी होगी। वहां परिचर्चा रखी गई है लेकिन मंगलवार देर रात तक न तो व्याख्यान का विषय तय हो सका था न विद्वानों के नाम।
श्रद्धालु और शोधार्थी संत तुलसी की निशानियों के दर्शन बुधवार को जयंती पर कर सकेंगे लेकिन पोथी सुलभ नहीं होगी। 2012 में चोरी गई मानस पोथी की बरामदगी होने के बाद मंदिर प्रबंधन ने पोथी को तुलसी घाट पर बन रहे संग्रहालय में रखवा दिया है। काशी में तुलसी जयंती पर कोई बड़ा कार्यक्रम घोषित नहीं है। बता दें कि बीते वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र में आए थे, तो उन्होंने तुलसी, कबीर के साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए ठोस कदम उठाने का संदेश दिया था, ताकि देश-दुनिया के लोग उनकी अमर कृतियों के बारे में जान सकें। इस दिशा में अब तक कोई काम नजर नहीं आया है।