यह प्रेम किसी जोड़े का नहीं बल्कि समझ का प्रेम है जो एक बहिष्कृत मनुष्य को अंतत: स्वीकारता है। जब गोधन पंचलाइट जलाता है, तब वह सिर्फ टोली को रोशन नहीं करता वह मनुष्य की आत्मा में फंसी कालिख को भी मिटा देता है। जहां दृश्य मौन हो जाते हैं और प्रकाश बोल उठता है। छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा नाटक में हास्य, प्रेम और सिनेमा के गानों का सहारा लेकर इसे रोचक बनाने का प्रयास किया है। कलाकारों में शिवप्रकाश, सुप्रिया, अवनीश, पंखुरी, अर्पिता, हरिओम, घनश्याम, आरजू, प्रथमेश रहे।
तीसरी प्रस्तुति मुंशी प्रेमचंद की रचना को सूरज प्रताप सिंह के निर्देशन में दिल्ली पब्लिक स्कूल के बच्चों ने प्रस्तुत किया। यह कहानी इंसान और जानवर के बीच के उस आत्मिक संबंध को दर्शाती है जो भाषा से नहीं, भावना से जुड़ता है। कहानी के जरिए बालकलाकारों ने संदेश दिया कि सच्चाई और वफादारी कभी व्यर्थ नहीं जाती, चाहे परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो? ब्रेख्यितन शैली में प्रस्तुत नाटक की शुरूआत दो नट-नटी के हास्य और संवाद से हुई।
कहानी में गांव की मिट्टी की खुशबू, हास्य की लय, लोकगीतों का रस और भावना की गहराई देखने को मिली। नाटक आधुनिक थिएटर के सभी तत्वों और दृश्य काव्य को मिलाकर टोटल थिएटर के रूप में मंचित किया गया। कलाकारों में आरवी, इंशिरा, मानवी, अद्वैत, सिद्धांत, पहल, जयवर्धन, अनंत व जैतिक ने भूमिका निभाई।
आज के नाटक : राम दूत अंगद और गगन दमाम बाज्यों।