शहीद के घर पर जुटे ग्रामीण
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धर्मेंद्र आखिरी बार अपने घर भड़ियाधर गांव दो माह पूर्व एक दिन के लिए आए थे। इस दौरान माता पिता के साथ भाईयों और परिवार के सदस्यों से मिले। साथ ही जल्द आने की बात कहकर सुकमा के लिए निकले। इस दौरान धर्मेंद्र को क्या पता था कि जन्मभूमि की माटी का यह उनका आखिरी स्पर्श होगा।
नक्सली हमले में धर्मेंद्र के शहीद होने की सूचना सबसे पहले उसके बड़े भाई महेंद्र यादव को उसकी मोबाइल पर सीआरपीएफ कैंप कार्यालय से दी गई। उस समय करीब तीन बज रहा था, महेंद्र इस समय अक्सर चिरैयाकोट बाजार में रहता है, लेकिन मंगलवार को संयोग ही था कि वह घर पर था।
महेंद्र के अनुसार सूचना पर उसे यकीन नहीं हुआ, इस दौरान वह दुबारा उस नंबर पर खुद फोन मिलाया। इस दौरान सूचना की पुष्टि होने पर वह काफी देर तक अवाक रहा। इसके बाद उसने हिम्मत जुटाकर इस सूचना से वृद्ध पिता और मां प्रभावती के साथ परिवार के अन्य सदस्यों का दिया।
फिर क्या था, पल भर में घर का माहौल गमगीन हो गया। इस दौरान पास पड़ोसी अवाक थे, कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि परिवार के सभी सदस्य रो रहें। बाद में पड़ोसियों के साथ पूरे गांव को इस घटना की जानकारी हो गई। बताते चलें कि दो माह पूर्व धर्मेंद्र 10 दिनों के लिए घर आया था।
धर्मेंद्र की पत्नी उमा यादव अपने बच्चों तीन बच्चों को पढ़ाने के लिए इलाहाबाद के फाफा मऊ स्थित सीआरपीएफ कैंप में रहती हैं। बेटे की मौत की सूचना मिलने पर परिवार के सभी सदस्य रोने लगे, लेकिन मां प्रभावती जवान बेटे हमले में शहीद होने की सूचना मिलने पर पछाड़े खाकर जमीन पर गिर गई। रोते-रोते प्रभावती बेटे की यादों को बयां कर रही थी, इस दौरान प्रभावती के मुंह से निकल रहा था अब केकरे सहरवा जियब हो मईया, केके ललवा बोलाइब हो मईया, केकर रहिया निहारब हो मईया। इन शब्दों को सुनकर वहां मौजूद सभी लोग फफक कर रोने लगे।
शहीद के रोते बिलखते परिजन
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बलिया के चितबड़ागांव थाना क्षेत्र के उसरौली गांव निवासी सीआरपीएफ के जवान मनोज कुमार सिंह (35) भी सुकमा, छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हो गए। यह खबर मिलते ही गांव और परिवार में शोक छा गया। सूचना मिलने के बाद शहीद के घर लोगों का तांता लगा रहा।
मनोज छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ में 17 साल से कांस्टेबिल थे। थाना क्षेत्र के उसरौली निवासी शहीद मनोज के पिता नरेंद्र नारायण सिंह भी सीआरपीएफ से ही अवकाश प्राप्त हैं। अपने नौजवान बेटे के शहीद होने की सूचना मिलने पर वे गमगीन थे।
घर के भीतर मनोज की पत्नी सुमन रो रही थी। पड़ोस की महिलाएं उसे संभाल रही थी। मनोज कुमार सिंह के दो बेटे प्रिंस 6 वर्ष और प्रतीक 4 वर्ष हैं। उनको देखकर हर किसी की आंखें नम थीं। इस दौरान गांव में ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई थी।
परिजनों के अनुसार मनोज कुमार सिंह 15 दिन की छुट्टी बिताकर शनिवार 10 मार्च को ड्यूटी के लिए घर से लौटे थे। संयुक्त मकान में रह रहे मनोज सिंह अलग मकान बनाने के लिए योजना बनाकर घर से गए थे। उनका सपना अलग मकान बनाने का था। शहीद का एक भाई दिल्ली में प्राइवेट सर्विस करता है। लोगों को मनोज के शव आने की प्रतीक्षा है।