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जब बेड पर थे छन्नूलाल: वे कहते थे...स्वास्थ्य ठीक रहा तो काशी के घाट पर गाएंगे, सुनाया था- खेले मसाने में होरी

Sat, 04 Oct 2025 04:30 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

खेले मसाने में होली..दिगंबर खेले मसाने में होली। जाने माने शास्त्रीय गायक पंडित छन्नू लाल मिश्रा ने बीते फरवरी महीने में अपने गीत के चंद टुकड़े गुनगुनाए थे। यह वीडियो तब की है जब बीते फरवरी महीने में अमर उजाला वाराणसी की संपादक उपमिता वाजपेयी उनसे मिलने मिर्जापुर गई थीं।
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पंडित छन्नूलाल मिश्रा ने गुनगुनाए थे गीत। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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फरवरी की बात है। सुरों के आला पंडित छन्नूलाल मिश्र अपनी बेटी के घर मिर्जापुर में रह रहे थे। घर के बाहर बोर्ड लगा था - संगीत संत पद्म विभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र, मिलने का समय 7 से 9 बजे। भीतर अस्पताल वाले बेड पर पंडित मिश्र बिना हिले-डुले लेटे हुए थे। 

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लाल गोल तिलक उनकी पुरानी शनाख्त सा ललाट पर धरा हुआ था। चेहरा मुरझाया सा था। लेकिन बनारस का नाम सुना तो आंखें टिमटिमाने लगीं। बनारस से 70 किमी दूर उन्हें बनारस बहुत याद आता था।

वो बहुत बातें करना चाहते थे। लेकिन सेहत इजाजत नहीं दे रही थी। फिर भी कभी अपने ही गानों की अधूरी लाइनों में तो कभी छोटी-बड़ी गैबी के काशी के इलाकों में वो अपना पुराना वक्त खोजने की कोशिश कर रहे थे। वे लंबे समय से बीमार थे। बमुश्किल किसी उत्सव-आयोजन में जा पाते थे। 
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मंच पर सुनाए उन्हें अरसा हो चुका था। लेकिन धुन-लय अब भी जस की तस थी। हाथ कंपकंपाते थे लेकिन कंठ से निकले सुर बिल्कुल सधे हुए। संगीत, काशी, मसाने की होरी पर उनसे बहुत सारी बातें हुई। संभवत ये पंडित छन्नूलाल जी की आखिरी ऐसी अनौपचारिक मुलाकात थी।

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पूरी की थी फरमाइश

बनारस याद आता है? क्या-कुछ याद आता है- हमारा पूजा करना याद आता है। छोटी गैबी में रहते थे। जो कहने के लिए छोटी गैबी है लेकिन है बड़ी गैबी। काशी को जब याद करते हैं तो कौन सा गाना याद आता है - बहुत दिन हो गया। लेकिन शिष्यों को सिखाते थे। सब फरमाइश करते थे, गुरुजी सुनाइए। खेले मसाने में होरी। 

हमें भी सुना दीजिए गुरुजी - खाने का और गाने का मन नहीं कर रहा है। उनका केयरटेकर गाने के लिए मना करता है, टोकते हुए कहता है - डॉक्टरवा मना किए हैं अभी बोलने, गाने को। पर पंडित छन्नूलाल कहा रुकनेवाले थे। वो गाने लगते हैं। चार अधूरी लाइनें गाए ही थे कि शब्द बिसरने लगते हैं। कहते हैं - शब्दवा भूल जात हैं। 

फिर कहते हैं - काशी में प्रोग्राम करेंगे। स्वास्थ्य ठीक रहा तो काशी के घाट पर करेंगे। हमने पूछा - मसाने में होरी सुनाएंगे, तो बोले - वो हमीं ने बनाया है। फिर वो गाने लगते हैं- चिताभस्म भरी झोरी, दिगंबर खेलें मसाने में होरी। आखर आखर गाना समझाते भी हैं, होली में कौन कौन था, गोपन गोपी, श्यामन राधा। फिर कुछ देर टकटकी लगाए कमरे की छत को देखते हैं और फिर आराम करने लगते हैं।

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