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मार्क्सवादी समाज दर्शन की गहरी समझ रखते थे चंद्रबली सिंह

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हिंदी के प्रतिभाशाली प्रगतिवादी समालोचक चंद्रबली सिंह मार्क्सवादी समाज दर्शन की गहरी समझ रखने वाले बौद्धिक अध्येता और व्याख्याकार थे। समाज से व्यक्ति का व व्यक्ति से समाज के परायेपन की भावना को कैसे खत्म किया जाए इसको उन्होंने गहरे अर्थों में आत्मसात किया था। 23 मई को उनकी पुण्यतिथि है।
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साहित्यकार डॉ. रामसुधार सिंह ने बताया कि चंद्रबली सिंह का जन्म 20 अप्रैल 1924 को गाजीपुर और मृत्यु 23 मई 2011 को वाराणसी में हुई थी। वह एक लेखक होने के साथ-साथ उत्कृष्ट कोटि के अनुवादक एवं आलोचक थे। उदय प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय में उन्होंने लगभग 40 वर्ष तक अध्यापन किया। 1982 में वह जनवादी लेखक संघ के महासचिव चुने गए और उसके बाद अध्यक्ष पद पर 15 साल तक रहे। वह मार्क्सवादी समाज दर्शन की गहरी समझ रखने वाले बौद्धिक अध्येता और व्याख्याकार थे।
नोबेल पुरस्कार विजेता चिली के कवि पाब्लो नेरुदा के जन्मशती वर्ष में उनके द्वारा किया गया अनुवाद पाब्लो नेरुदा कविता संचयन 2004 में छपा था। इसके अलावा उन्होंने नाजिम हिकमत, वाल्ट ह्विटमैन, एमिली डिकिन्सन, ब्रेख्त, मायकोव्स्की, राबर्ट फ्रास्ट जैसे विख्यात विशिष्ट कवियों का भी अनुवाद किया है। डॉ. सिंह ने बताया कि मुझे तो उनके साथ विद्यार्थी और सहयोगी की भूमिका अदा करने का अवसर मिला। वह जितने अच्छे अध्यापक थे उतने ही अच्छे सहयोगी भी थे।
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केदारनाथ सिंह भी उनके विद्यार्थी रहे और वह कहा करते थे कि उनके अंदर जो साहित्य की समझ विकसित हुई वह चंद्रबली गुरुजी की अंग्रेजी की कक्षाओं में अध्ययन के बाद ही हुई। उनकी दृष्टि स्पष्ट थी। वह तथाकथित मार्क्सवादी की दकियानूसी विचारधारा से अलग थे। उनका मानना था तुलसीदास जनआकांक्षा के बड़े कवि थे।
डॉ. काशीनाथ सिंह भी कहते हैं कि आलोचना के समानांतर उनका अनुवाद कार्य अद्भुत है और उन्होंने जिनके अनुवाद किए हैं वे एक तरह के कवि नहीं हैं। प्राय: मार्क्सवादी समीक्षक अपाठ्य, दुर्गम, खूसट और सठियाये हुए गद्य लिखते हैं, इससे मास्टर साहब (चंद्रबली सिंह) की समीक्षा दूर है। अपने समकालीन आलोचकों में उनका एक अलग स्थान था। उन्होंने अपनी परंपरा का सावधान मूल्यांकन किया तथा पूरी जिम्मेदारी और दायित्व बोध से साहित्य समग्र में काम किया। वह कहते थे कि वर्तमान के यथार्थ का अगर हमने सामना करना नहीं सीखा तो हम भविष्य नहीं बना सकते।
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