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Varanasi News: नई पीढ़ी को देंगे ब्राह्मी लिपि की शिक्षा, गंगा तट पर क्लास शुरू; प्राचीन शिलालेख पढ़ेंगे युवा

Mon, 24 Jun 2024 10:41 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी

सार

Varanasi News: ब्राह्मी लिपि को सीखकर युवा प्राचीन से प्राचीन शिलालेख भी स्वयं पढ़ सकेंगे और उसके बारे में लोगों को बता भी सकेंगे। नई पीढ़ी को विश्व की सबसे प्राचीन लिपि सिखाने का यह क्रम जारी रहेगा।
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ब्राह्मी लिपि के बारे में सीखेंगे युवा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्राचीन शिलालेखों की भाषा अब किसी के लिए भी अबूझ नहीं होगी। बनारस के गंगा घाटों पर विश्व की सबसे प्राचीन लिपि की निशुल्क कक्षाएं शुरू हो गई है। नई पीढ़ी को ब्राह्मी लिपि से रूबरू कराने और प्राचीन ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञ डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन और डॉ. इंदु जैन राष्ट्रगौरव ने उठाया है।

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अस्सी घाट से ब्राह्मी लिपि प्रशिक्षण की कार्यशाला आरंभ हुई है जो राजघाट तक विभिन्न घाटों पर नियमित चलेगी। ब्राह्मी लिपि की कार्यशाला में पहले दिन काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और हरिश्चंद्र महाविद्यालय के साथ ही बाहर से आए पर्यटकों ने भी हिस्सा लिया। पहले दिन कार्यशाला में प्रशिक्षण के साथ ही युवाओं ने ब्राह्मी लिपि का रोजाना अभ्यास करने का संकल्प लिया।

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के जैन दर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. फूलचंद्र जैन की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से इस कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन ने बताया कि गंगा के तट पर समय-समय पर ब्राह्मी लिपि की यह कार्यशाला अब नियमित रूप से चलेगी।

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राजा ऋषभदेव की पुत्री के नाम पर पड़ा है लिपि का नाम

ब्राह्मी लिपि के बारे में सीखेंगे युवा। - फोटो : अमर उजाला
डॉ. इंदु जैन राष्ट्र गौरव ने बताया कि नई पीढ़ी को सभी लिपियों की जननी और विश्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सिखाने के उद्देश्य से इस कार्यशाला की शुरुआत की गई है। जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने राजा ऋषभदेव के रूप में सर्वोत्तम राज्य किया था। 

राजा ऋषभदेव ने सर्वप्रथम बालिका शिक्षा का उद्घोष करते हुए अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या एवं पुत्री सुंदरी को अंक (गणित) विद्या सिखाई थी। अंक विद्या का विकास आज गणित के रूप में है और ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रसिद्ध हुई और इसी लिपि से सभी लिपियों का जन्म और विकास हुआ है। बताया कि भारत का नाम भी राजा ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर पड़ा।
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