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बीएचयू पर टिका है पारा का 'अस्तित्व', खत्म होगा या बचा रहेगा

Sun, 20 Oct 2019 02:12 AM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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पारा (प्रतीकात्मक तस्वीर) । - फोटो : अमर उजाला
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मरकरी (पारा) का प्रयोग आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में होता है। इसका प्रयोग आगे होगा या नहीं, इस पर संशय बना हुआ है। फैसला संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की टीम करेगी और इसका केंद्र बीएचयू बनेगा।

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28-29 सितंबर को अहमदाबाद में हुई बैठक में मिनामाटा समझौते के तहत औद्योगिक इकाइयों में मरकरी के प्रयोग पर रोक लगाने पर सहमति बनी थी और 2025 तक इसका प्रयोग पूरी समाप्त करने का निर्णय लिया गया था। अब दवा बनाने में इसके प्रयोग पर फैसला संयुक्त विकास टीम पर टिका है। टीम बीएचयू आकर औषधियों के सैंपल लेगी और रिपोर्ट के आधार पर फैसला होगा।

मरकरी का प्रयोग कई आयुर्वेदिक औषधियों में होता है। थर्मामीटर और बैरोमीटर आदि उपकरण बनाने में भी मरकरी का प्रयोग होता है। औद्योगिक इकाइयों में पाइप निर्माण, पेस्टीसाइड और कास्मेटिक आदि में भी इसका प्रयोग हो रहा है।

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अहमदाबाद में सितंबर में हुई दो दिवसीय बैठक में बताया गया था कि औद्योगिक इकाइयों में मरकरी का प्रयोग सेहत के लिए हानिकारक है। लिहाजा मिनामाटा समझौते के तहत संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व को मरकरी से मुक्त कराने का निर्णय लिया है। इसी उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम टीम का गठन किया गया है।

यह भी तय हुआ था कि देश में आयुर्वेदिक औषधियों को छोड़कर बाकी जगहों पर इसका प्रयोग बंद कर दिया जाए। विशेषज्ञों का दावा है कि आयुर्वेद में शोधन और संस्कार के बाद मरकरी के प्रयोग के कारण कोई नुकसान नहीं होता है। इसी का परीक्षण संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की टीम बीएचयू में करेगी।

आईआईटी मद्रास में होगा परीक्षण 
बीएचयू आने वाली टीम आयुर्वेदिक औषधियों के सैंपल लेगी। आईआईटी मद्रास की प्रयोगशाला में इनका परीक्षण किया जाएगा। इसके अलावा आईआईटी कानपुर, मुंबई, दिल्ली आदि के प्रोफेसर, सीएसआईआर नीरी नागपुर और दिल्ली के वैज्ञानिक इसकी गुणवत्ता आदि पर प्रकाशित शोध पत्रों का अध्ययन करेंगे। इन सभी के आधार पर मरकरी के प्रयोग पर रिपोर्ट देंगे। 

पारे का सेहत पर असर
पारा ऐसी धातु है जो सामान्यतया द्रव अवस्था में रहती है। इसका वाष्पीकृत और कार्बनिक रूप स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। बीएचयू आयुर्वेद संकाय के रसशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. आनंद चौधरी के अनुसार, वाष्पीकृत और कार्बनिक रूप में प्रयोग से मस्तिष्क संबंधी बीमारियां होने का खतरा रहता है। सांस लेने, उदर रोग, हड्डी आदि में भी विकृतियां उत्पन्न होने लगती हैं। आयुर्वेद में यह अकार्बनिक  सल्फाइड के रूप में प्रयोग होता है जो हानिकारक नहीं है।
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आयुर्वेद संकाय में रसशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद चौधरी ने बताया कि दवा निर्माण में मरकरी के प्रयोग के फैसले के बाद संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की टीम बीएचयू आएगी। टीम के सदस्य यहां दवाओं के निर्माण के बारे में जानकारी और सैंपल लेंगे।
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