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BHU : 65 साल के बुजुर्ग की बिना चीर फाड़ हुई हार्ट की सर्जरी, डाॅक्टरों ने किया कमाल; जोखिम भरा था ऑपरेशन

Fri, 27 Dec 2024 01:48 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News : IMS BHU के कार्डियोलॉजी विभाग के कुशल डॉक्टरों ने बुजुर्ग का इलाज किया है। ऐसे रोगियों की ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ती थी, जिसमें खतरा बहुत ज्यादा रहता था। सेफ्टी के साथ जोखिम उठाते हुए डाॅक्टरों ने बुजुर्ग को नया जीवन दिया है।
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बुजुर्ग का इलाज करने वाली डाॅक्टरों की टीम। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आईएमएस बीएचयू के कार्डियोलॉजी विभाग के कुशल डॉक्टरों प्रो. विकास अग्रवाल, डॉ. प्रतिभा राय, डॉ. सृष्टि और डॉ. अर्जुन की टीम के नेतृत्व में एक 65 वर्षीय पुरुष के जटिल वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (वीएसडी) डिवाइस क्लोजर को सफलतापूर्वक किया गया, जो मायोकार्डियल इंफार्क्शन (एमआई) से उबर रहा था, जिसे आमतौर पर हार्ट अटैक कहा जाता है।

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यह मामला इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वीएसडी डिवाइस क्लोजर के अलावा, रोगी को उसकी अवरुद्ध कोरोनरी धमनियों के लिए एंजियोप्लास्टी प्रक्रिया भी प्राप्त हुई। पहले फॉलोअप के समय रोगी अब अपनी नियमित गतिविधियों में वापस आ गया है।

वेंट्रिकुलर सेप्टम में छेद होना (वीएसआर) मायोकार्डियल इंफार्क्शन (एएमआई) की एक दुर्लभ लेकिन जीवन-संकट में डालने वाला कॉम्प्लिकेशन है। 

वेंट्रिकुलर सेप्टम, दाएं हृदय (कम ऑक्सीजन रक्त ले जाने वाला) को बाएं हृदय (ऑक्सीजन युक्त रक्त ले जाने वाला) से अलग करने वाली संरचना है, यदि इसकी रक्त आपूर्ति प्रभावित होती  है, तब उसमें necrosis के पश्चात rupture हो सकते हैं।

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बुजुर्ग को मिला नया जीवन
इस क्षति के परिणामस्वरूप सेप्टम नेक्रोसिस हो सकता है और सेप्टम में बाद में छेद हो सकता है। वीएसआर के रोगी अक्सर गंभीर रूप से बीमार होते हैं, जिससे कई गंभीर चुनौतियां सामने आती हैं। समय पर हस्तक्षेप के बिना, इस स्थिति में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। परंपरागत रूप से, सर्जिकल तरीके से छिद्र को बंद करना उपचार था, लेकिन यह काफी जोखिम के साथ था।

डॉ. विकास अग्रवाल ने पोस्ट-एमआई वीएसआर क्लोजर की तकनीकी कठिनाइयों को रेखांकित किया। खासकर बुजुर्ग रोगियों में। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैथ लैब की तकनीकों में प्रगति अब इन बीमारियों को कम से कम खतरे एवं बिना चीड़ फाड़ के साथ ठीक करना संभव बनाती है।

सीटीवीएस के विभागाध्यक्ष प्रो. सिद्धार्थ लखोटिया ने कहा कि पहले इस तरह के रोगियों में ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ती थी, जिसमें खतरा बहुत ज्यादा रहता था।
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