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BHU : भोजपुरी अध्ययन केंद्र में इस साल शोध नहीं, नहीं मिला PhD का ब्योरा; एंग्जंक्ट फैकल्टी की सुविधा भी बंद

Thu, 05 Dec 2024 02:33 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News : बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र में 12 पीएचडी छात्र बचे हैं। स्थापना के बाद से इस केंद्र में अभी तक 30 से ज्यादा शोध हो चुके हैं।
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BHU - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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‘ए बारी बीएचयू में भोजपुरिया से पीएचडी न होई। भोजपुरी अध्ययन केंद्र से एगो सीट पर प्रवेश ना मिली अउर नाहीं एक्को मास्टर ही पढ़ावे बदे बचलन।’ पूर्वी यूपी और बिहार की शान भोजपुरी पर होने वाले शोधों पर बड़ा खतरा आ गया है। 

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बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र में सत्र 2024-25 के लिए पीएचडी में एडमिशन होने की संभावना न के बराबर है। कुछ दिनों में आने वाली पीएचडी बुलेटिन में इस केंद्र में पीएचडी सीटों का विवरण नहीं जोड़ा गया है। न तो इस केंद्र से जुड़कर नए छात्रों को पीएचडी कराने वाले कोई एंग्जंक्ट प्रोफेसर बचे हैं और न ही केंद्र ने परीक्षा नियंता कार्यालय को सीटों का विवरण भेजा है। फिलहाल, इस केंद्र में तीन कोर्स का संचालन हो रहा है। भोजपुरी और जनपदीय अध्ययन में एक और दो साल का डिप्लोमा और चार महीने का भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स चलाया जा रहा है। 

पूर्व समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के कार्यकाल तक 27 पीएचडी हो चुकी है। उनके समय में दो पीएचडी छात्रों राणा अवधूत और धीरज गुप्ता ने अपनी थीसिस शुद्ध भोजपुरी में ही लिखी थी। 2009 में केंद्र की स्थापना हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सदानंद शाही ने की थी।

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भोजपुरिया माटी के छात्रों में हड़कंप
भोजपुरिया माटी के छात्रों में शोध सीट न आने की सूचना पर हड़कंप मचा हुआ है। 2014 से पीएचडी कराने के लिए सहायक एंग्जंक्ट प्रोफेसर की व्यवस्था शुरू की गई थी। इसमें ये हुआ कि दूसरे विभागों और संस्थानों के प्रोफेसर को चुना जाता था। वे ही यहां के बच्चों को अपने-अपने विषयों में पीएचडी कराते थे।

ये फैसला पूर्व कुलपति प्रो. डीपी सिंह के कार्यकाल के दौरान 2014 के एग्जीक्यूटिव काउंसिल के फैसले में पारित किया गया था। लेकिन, पिछले साल दिसंबर की एकेडमिक काउंसिल (ईसी से छोटी इकाई) में इस व्यवस्था को बंद करने की संस्तुति कर दी गई। इससे नए एडमिशन लेने वालों को एक भी प्रोफेसर नहीं मिलते। पुराने छात्रों को ही पीएचडी कराई जाएगी।
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भोजपुरी में उच्च गुणवत्ता का होता था रिसर्च
हिंदी के छात्र मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि बनारस में भोजपुरी का इससे बड़ा कोई नुकसान नहीं होगा। यहां बीएचयू की वजह से ही भोजपुरी में उच्च गुणवत्ता का शोध होता था। बनारस भोजपुरी का केंद्र है, यहां पर बड़े-बड़े विद्वानों और साहित्यकारों ने भोजपुरी की पैरवी की थी। हालांकि, केंद्र के वर्तमान समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह कई दिनों से प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए प्रयास में थे।

इस केंद्र में नहीं थी कोई परमानेंट फैकल्टी
परीक्षा नियंता कार्यालय की ओर से बताया गया है कि इस केंद्र में अब तक जितने भी शोध या पीएचडी हुए, वे भी केमेस्ट्री, सोशल साइंस या फिर दूसरे विषय के शोधार्थी रहे। इस केंद्र में किसी सहायक फैकल्टी स्थाई नियुक्ति नहीं होती थी। दूसरे संकायों के शिक्षक ही यहां पर पढ़ाते हैं।  कला संकाय के डीन प्रो. माया शंकर पांडेय ने कहा कि इस मामले को लेकर कुछ भी नहीं कहना। 
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