भोजपुरिया माटी के छात्रों में हड़कंप
भोजपुरिया माटी के छात्रों में शोध सीट न आने की सूचना पर हड़कंप मचा हुआ है। 2014 से पीएचडी कराने के लिए सहायक एंग्जंक्ट प्रोफेसर की व्यवस्था शुरू की गई थी। इसमें ये हुआ कि दूसरे विभागों और संस्थानों के प्रोफेसर को चुना जाता था। वे ही यहां के बच्चों को अपने-अपने विषयों में पीएचडी कराते थे।
ये फैसला पूर्व कुलपति प्रो. डीपी सिंह के कार्यकाल के दौरान 2014 के एग्जीक्यूटिव काउंसिल के फैसले में पारित किया गया था। लेकिन, पिछले साल दिसंबर की एकेडमिक काउंसिल (ईसी से छोटी इकाई) में इस व्यवस्था को बंद करने की संस्तुति कर दी गई। इससे नए एडमिशन लेने वालों को एक भी प्रोफेसर नहीं मिलते। पुराने छात्रों को ही पीएचडी कराई जाएगी।
भोजपुरी में उच्च गुणवत्ता का होता था रिसर्च
हिंदी के छात्र मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि बनारस में भोजपुरी का इससे बड़ा कोई नुकसान नहीं होगा। यहां बीएचयू की वजह से ही भोजपुरी में उच्च गुणवत्ता का शोध होता था। बनारस भोजपुरी का केंद्र है, यहां पर बड़े-बड़े विद्वानों और साहित्यकारों ने भोजपुरी की पैरवी की थी। हालांकि, केंद्र के वर्तमान समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह कई दिनों से प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए प्रयास में थे।
इस केंद्र में नहीं थी कोई परमानेंट फैकल्टी
परीक्षा नियंता कार्यालय की ओर से बताया गया है कि इस केंद्र में अब तक जितने भी शोध या पीएचडी हुए, वे भी केमेस्ट्री, सोशल साइंस या फिर दूसरे विषय के शोधार्थी रहे। इस केंद्र में किसी सहायक फैकल्टी स्थाई नियुक्ति नहीं होती थी। दूसरे संकायों के शिक्षक ही यहां पर पढ़ाते हैं। कला संकाय के डीन प्रो. माया शंकर पांडेय ने कहा कि इस मामले को लेकर कुछ भी नहीं कहना।