प्रसिद्ध कवि व आलोचक प्रो. आशीष त्रिपाठी ने कहा कि 1757 के पहले का लोक ही अपने मूल में था। आज का लोक औपनिवेशिक काल में बने लोक का रूप है। हमें लोक के औपनिवेशीकरण और राष्ट्रीयकरण के ऊपर ध्यान देने की जरूरत है। बुधवार को भोजपुरी चित्रकला: लोक, प्रकृति और कला विषय पर चर्चा-परिचर्चा हुई। बीएचयू के डॉ. शांतिस्वरूप सिन्हा ने कहा कि भोजपुरी चित्रों को हम सामान्य रूप से तीन भागों में बांट सकते हैं। भित्ति चित्र, भूमि चित्र और कपड़े पर बनाए जाने वाले चित्र हैं। इसके अलावा देह पर बनाने वाला चित्र गोदना है। डॉ. सुशांत कुमार शर्मा, डॉ. सुनील कुमार विश्वकर्माए प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. नीरज खरे, डॉ. विवेक कुमार सिंह, डॉ. रविशंकर सोनकर, डॉ. कुमार अम्बरीष चंचल आदि आदि रहे।