रथ को उठाने से लगता है कि धर्म के लिए कुछ तो कर रहे
30 साल से यहां आ रहे मुन्ना यादव ने अपने साथ अपने दोनों बच्चों को भी लेकर आए। उन्होंने कहा कि ये परंपरा बच्चों में ऐसी घर कर चुकी है कि अब कहीं कुछ भी करें, वे इस दिन यहीं आते हैं। बेटा अर्पित यादव ने कहा कि विमान उठाकर आगे ले जाते हैं। वीडियो गेम खेलता हूं लेकिन उससे भी अच्छा यह लगता है। रथ को उठाने से लगता है कि धर्म के लिए कुछ तो कर रहे हैं।
मोबाइल गेम और यूट्यूब से बेहतर है यहां आना
एक दादी अपने पोते-पोतियों को लेकर पहुंचीं। उनका नाम कृष्णा जायसवाल है। उन्होंने कहा कि बेटे-बहू घर पर हैं, लेकिन इन बच्चों में इस परंपरा को जीवित करना है। वह बचपन से ही यहां आती हैं। पति भी कई बार साथ में आते थे। वहीं, अपने 10 महीने के पोते लल्ला यादव को लेकर पहुंचे विष्णु यादव ने कहा कि ये बच्चे का पहला भरत मिलाप है। वहीं, दूसरा बच्चा साहिल और समर यादव पांच साल से लगातार आ रहे हैं। इन बच्चों ने कहा कि मोबाइल गेम भी खेलते हैं और यूट्यूब भी चलाते हैं लेकिन यहां आने जैसा अच्छा कुछ भी नहीं। मैदागिन के दुकानदार राहुल यादव ने कहा कि 20 साल से आ रहा हूं। पिता और दादा जी भी आते रहे हैं। कोई दबाव नहीं है। बाप-दादा की परंपरा है। पुरखे भेजते थे कि यादवों की पुरानी परंपरा है। हमारा बचपन बिना भरत मिलाप के पूरा ही नहीं हुआ। भगवान कुछ क्षण के लिए प्रकट होते हैं।
पहली बार ये पता करने आई कि क्यों मजबूत है ये आस्था
पहली बार आईं लक्ष्मी यादव ने कहा कि ऐसा नहीं लगा कि मेला में कुछ अंजान जैसा है। सबसे पहले राजा साहब का दर्शन हुआ और आस्था की इतनी मजबूती देखकर गर्व महसूस हो रहा है। वर्षा श्रीवास्तव ने कहा कि वे 30 साल से यहां पर उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं। विवाह होने के दौरान ही ये फैसला लिया था कि यहां आना नहीं छोड़ूंगी। छात्राओं ने कहा कि हम लोग यहीं के निवासी हैं और बिना गैप किए हर साल आते हैं।