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लाखों का लोभ के कारण नहीं छूट पाता है कोटे का मोह

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बलिया में सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान यानी कोटा के लिए आयोजित खुली बैठक में बृहस्पतिवार को एक व्यक्ति की जान चली गई। इसकी चर्चा शुक्रवार को बिहार की सीमा से लेकर लखनऊ तक रही। जानकारों का कहना है कि प्रतिमाह लाखों की अवैध कमाई के चलते कोटा का मोह नहीं छूट पाता है। इसीलिए खुली बैठकों में अक्सर विवाद होते हैं।
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सरकार के निर्देश के अनुसार, गांव में प्रधान, प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों की मौजूदगी में खुली बैठक आयोजित कर किसी एक को कोटा आवंटित करने पर सहमति बनाई जाती है। या फिर बहुमत के आधार पर कोटेदार का चयन किया जाता है। इसमें स्वयं सहायता समूह को प्राथमिकता देने का प्रावधान है। जानकारों का कहना है कि कोटेदार के चयन में ग्राम प्रधान और उससे जुड़े लोगों की भूमिका अहम रहती है। इसके बाद जिसे कोटा मिल जाता है, लंबे समय तक उसी के पास रहता है। कोई गंभीर शिकायत मिलने पर ही कोटे का आवंटन निरस्त किया जाता है या फिर खुली बैठक आयोजित कर नए कोटेदार का चयन किया जाता है।
ऐसे होती है प्रतिमाह लाखों की कमाई
जानकारों के अनुसार, घटतौली से बड़ी मात्रा में अनाज बचा लिया जाता है। यही नहीं, प्रति यूनिट राशन की कटौती भी कोटेदार करते हैं। जैसे, किसी के घर में सात लोग यानी सात यूनिट का राशन कार्ड बना है। वह जब महीने में सरकारी गल्ले की दुकान पर राशन लेने जाएगा तो कोटेदार उसे यही कहेगा कि इस बार आपका दो यूनिट अनाज ऊपर से कट गया है। हालांकि, सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया जाता है। दो से तीन रुपये प्रति किलोग्राम बचा अच्छी क्वालिटी का अनाज खुले बाजार में 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम बेंच दिया जाता है। कई बार ऐसे प्रकरण पकड़े भी जाते हैं, लेकिन यह अवैध काम कभी बंद नहीं होता है।
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ब्लॉक से लेकर जिला पूर्ति कार्यालय तक बंटवारा
सरकारी गल्ले की दुकान से प्रतिमाह गरीबों के राशन का जो खेल होता है, उसमें ब्लॉक स्तर से लेकर जिला पूर्ति कार्यालय तक के कर्मचारी और अधिकारी शामिल रहते हैं। काशी विद्यापीठ विकास खंड के एक कोटेदार ने शुक्रवार को नाम न छापने की शर्त पर कहा कि आप ईमानदारी से सरकारी गल्ले की दुकान चला ही नहीं सकते हैं। एक सिस्टम बना हुआ है, उसके तहत आपको सप्लाई इंस्पेक्टरों, बाबुओं और अन्य को पैसा देना ही होता है।
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