पं. कन्हैया लाल मिश्र
शास्त्रीय संगीत में स्वरों के सात प्रकार मिलते हैं। ये सातों स्वर पशु-पक्षियों से लिए गए हैं। ये स्वर प्रकृति के उपहार के ही रूप हैं। तभी तो इनके माध्यम से किसी भी भावात्मक चित्रकृति या बिंब को हू-ब-हू प्रस्तुत कर दिया जाता है। यही स्वरों की सबसे बड़ी ईश्वरीय शक्ति है। मल्हार कोयल की कूक को, पपीहे की हूक को दर्शाता है। शब्दों के बिना मल्हार के स्वरों के जरिए प्रकृति के भावों का अहसास सहज, सजीव और सुंदर तरीके से कराया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है रियाज। कलाकार ने अगर साज को जिया है, उसकी साधना की है तो स्वरों के लगाव से वह किसी के भी तन-मन को छू लेगा।
ग्रीष्म ऋतु में मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी तक कष्ट में रहते हैं। उनमें इतनी पीड़ा भर जाती है कि वे प्रकृति को रिझाने के जतन में जुट जाते हैं। यही जतन संगीत में विरह के रूप में प्रकट होता है। हर परेशान मन पानी मांगने लगता है। चाहे प्यासी धरती हो या फिर विरहिणी, बारिश की बूंदों से पहले अपने भीतर की तपन को तृप्त करना चाहती है। एक बूंद गिरती है शरीर पर तो सभी प्रसन्न हो जाते हैं। पशु-पक्षी झूम उठते हैं। हर तरफ हरियाली छा जाती है। इस ऋतु में वो ताकत है कि प्यास से तड़पते व्यक्ति की पीर मिटती है। मोर एकांत में पंख पसार कर नाचता है। वह इस खुशी को दुनिया के आगे प्रगट नहीं होने देता। यह कहना है बनारस घराने के प्रसिद्ध सारंगी वादक पं. कन्हैया लाल मिश्र का।
वह कहते हैं कि मल्हार वैसा ही राग है जैसे बरसते हुए मेघ। अंदर से जब मल्हार उपजता है, साज पर निषाद स्वर लगता है तो पुकार मिलने लगती है। वह बंदिश बजाते हैं - पवन चलत दमकत दामिनी चले पवन सनन सनन/ बूंदन बरसे मनवां लरजे...। आयो गरजत बदरवा...। चहुंओर से उमड़-घुमड़ अति प्रचंड गहराए...। आए जोर घनघोर बरसन को...। वह कहते हैं कि पहली बरिश जब होती है तब मुख पर ही आदमी उसे रोपता है। सारंगी और मल्हार का सवाल आते ही वह बताते हैं कि आवाज का जो जादू इसमें है, वह किसी में नहीं। गज के जरिए हर भाव प्रगट होते हैं।
सारंगी पर मीड़-गमक दोनों के प्रयोग से बादर के गरजने का एहसास होता है तो बिजली की चमक खटका, मुर्की मारकर षड़ज पर आने से। बिजली की चमक और बारिश का एहसास कराया जा सकता है। यह सिर्फ सारंगी पर ही संभव है। साधना हो तो किसी भी साज पर इसका प्रयोग किया जा सकता है।