मुंबई में नौ अगस्त, 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पास होने के साथ ही मुंबई समेत देश भर में नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई थी।
वाराणसी में इसकी भनक लगते ही डॉ. संपूर्णानंद, त्रिभुवन सिंह, रघुनाथ सिंह और कमलापति त्रिपाठी जैसे बड़े नेता भूमिगत होकर आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए। इन नेताओं द्वारा हर बड़े मोहल्ले में एक-एक डिक्टेटर नियुक्त किया गया था।
करीब सप्ताह भर तक इन नेताओं ने पुलिस को छकाया। तब तक भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में पहुंच चुकी थी। उन दिनों काशी हिंदू विश्वविद्यालय देश में छात्र राजनीति का बड़ा केंद्र था।
राजनारायण, प्रभुनारायण सिंह जैसे छात्र नेता बीएचयू की अगुवाई करते थे। भारत छोड़ो आंदोलन की भावना को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए छात्रों की टोलियां शहर के अलावा आसपास के जिलों में भी सक्रिय हो गई।
अन्य कॉलेज के छात्रों से संपर्क कर आंदोलन को धार दी जाने लगी थी। करीब एक पखवारे बाद छात्रों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस फोर्स बीएचयू की तरफ बढ़ी थी।
उस समय डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन बीएचयू के कुलपति थे। बीएचयू परिसर के अंदर दाखिल होने के लिए अफसरों ने कुलपति से अनुमति मांगी। करीब चार घंटे तक फोर्स बीएचयू गेट पर खड़ी रही लेकिन डॉ. राधाकृष्णन ने पुलिस को परिसर घुसने की अनुमति नहीं दी। इससे छात्र नेता उत्साहित हो गए और धीरे-धीरे आंदोलन और तेज होता गया।
हालांकि बाद में राजनारायण और प्रभुनारायण समेत कई छात्रनेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आजाद भारत के पहले उप राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति बने थे।