महाराजा विभूति नारायण सिंह अपनी पत्नी महारानी साहिबा के अंतिम संस्कार के लिए घाट पर आए थे। मुखाग्नि वाले स्थान को चारों ओर से तिरपाल से ढंक दिया गया था, केवल छत खुली रखी गई थी। राजा साहब ने मुझसे कहा कि पहली अग्नि मुझे ही देनी होगी। मैंने मना किया और कहा कि महिलाएं ऐसा नहीं करतीं, लेकिन उनके आग्रह पर बाबा मसाननाथ का नाम लेकर मैंने ही आग जलाकर उन्हें सौंपी। पूर्व काशीराज और डोमराज के बीच आत्मीय संबंध थे। रामनगर की रामलीला में डोम राजा के दो इक्के और एक जीप खड़ी रहती थी। पूरे डोम परिवार में रामलीला देखने की परंपरा थी। कई बार राजा साहब ने कहा कि आप लोगों के लिए विशेष गाड़ी और जमीन की व्यवस्था करवा दूंगा, लेकिन हमने इन्कार कर दिया। काशीराज और डोमराज हर शिवरात्रि पर केदारनाथ और विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने जाते थे।
एक बार पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी की बहू का शव घाट पर आया। त्रिपाठी जी ने कहा कि पहली अग्नि आप दें। मैंने मना करते हुए कहा कि बहूजी ने ही 75 लाख रुपये की लागत से बिजली शवदाह गृह बनवाया है, फिर लकड़ियों पर अंतिम संस्कार क्यों? जब हमने इस व्यवस्था का विरोध किया था, तब बहूजी ने कहा था कि वहां केवल लावान्सश और गंगा में बहने वाले पशुओं के शव जलेंगे, लेकिन बाद में सभी शव वहीं जलने लगे। हम कालू डोम की पीढ़ी से हैं।
गंगा किनारे अब हमारे पास केवल यादों का पिटारा बचा है। इन घटनाओं की न कोई रिकॉर्डिंग है और न कोई तस्वीर सुरक्षित है। शादी के तीसरे साल ही पति का निधन हो गया। बाद में उनके छोटे भाई और डोमराज कैलाश चौधरी के निधन के बाद मैंने मसान की पारियों की जिम्मेदारी संभाली और महिलाओं में उसे बांटा। मणिकर्णिका पर कभी मसान की रानी तो कभी राजमाता बनकर परंपरा को आगे बढ़ाया। पहले महिलाओं को सिर उठाने तक की मनाही थी। पति के निधन के बाद दोबारा विवाह के बारे में सोचना भी गुनाह माना जाता था। मेरी शादी नौ साल की उम्र में हुई, तीन साल बाद गौना हुआ और फिर तीन साल बाद पति का निधन हो गया। -जमुना देवी, डोम परिवार की राजमाता, मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट