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25 दिन 25 कहानियां: बिना सूचना के डोम के घर लकड़ी के चूल्हे पर बनी पुड़ी-तरकारी खाने पहुंचे थे अटल बिहारी

Fri, 29 May 2026 03:51 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: डोमराजा परिवार की राजमाता ने बताया कि जब मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर अयोध्या गई थी, तब पास से दर्शन करने की इच्छा जताई। वहां एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “आपको तो दर्शन करवाऊंगा ही, क्योंकि आपने अटल बिहारी वाजपेयी जी को भोजन करवाया था। 
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डोम परिवार की राजमाता जमुना देवी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भाई जेलर थे तो पुलिसकर्मी सब्जियां काटने में लग गए और पीएम के लिए भोजन तैयार करने में जुट गए। हूटर की आवाज गूंजने लगी। अटल बिहारी को घर की छत पर बैठाया गया। लकड़ी के चूल्हे पर बनी पुड़ी-तरकारी, दही और मिठाई परोसी गई। साथ में मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और कई बड़े नेता भी थे। उन्होंने मेरे घर पर भोजन करने का मकसद तो नहीं बताया, लेकिन डोम के घर भोजन कर छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ संदेश देना चाहते थे।

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करीब 30 बरस पहले मई की गर्म दोपहरी में मणिकर्णिका घाट पर पारी चल रही थी। शेर कोठी में सोई थी कि मैनेजर दौड़ते हुए आए और बोले, “बुआ जल्दी उठिए, बाहर से कई लोग आए हैं।” बिना किसी सूचना के घर पहुंचे लोगों ने अपना परिचय देते हुए कहा, “हम अटल बिहारी वाजपेयी हैं। आपके घर में आपके हाथ का खाना खाएंगे, कल सुबह आठ बजे।” मैंने कहा, “यह तो मसान है। यहां लकड़ियों पर खाना बनता है।” इस पर उन्होंने कहा, “मुझे इन्हीं लकड़ियों पर बना भोजन करना है।”

अगले दिन सुबह उन्हें हरिश्चंद्र घाट वाले घर पर बुलाया गया। भाई जेलर थे, इसलिए पुलिसकर्मी भी सब्जियां काटने और भोजन तैयार कराने में जुट गए। हूटर की आवाज गूंजने लगी। अटल बिहारी वाजपेयी को घर की छत पर बैठाया गया। लकड़ी के चूल्हे पर बनी पुड़ी-तरकारी, दही और मिठाई परोसी गई। उनके साथ मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और कई अन्य नेता भी मौजूद थे। उन्होंने भोजन करने का कारण तो नहीं बताया, लेकिन ऐसा लगा कि डोम परिवार के घर भोजन कर वह छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ संदेश देना चाहते थे। जब मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर अयोध्या गई थी, तब पास से दर्शन करने की इच्छा जताई। वहां एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “आपको तो दर्शन करवाऊंगा ही, क्योंकि आपने अटल बिहारी वाजपेयी जी को भोजन करवाया था। उस समय मैं उनकी सुरक्षा में तैनात था।”

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महाराजा विभूति नारायण सिंह अपनी पत्नी महारानी साहिबा के अंतिम संस्कार के लिए घाट पर आए थे। मुखाग्नि वाले स्थान को चारों ओर से तिरपाल से ढंक दिया गया था, केवल छत खुली रखी गई थी। राजा साहब ने मुझसे कहा कि पहली अग्नि मुझे ही देनी होगी। मैंने मना किया और कहा कि महिलाएं ऐसा नहीं करतीं, लेकिन उनके आग्रह पर बाबा मसाननाथ का नाम लेकर मैंने ही आग जलाकर उन्हें सौंपी। पूर्व काशीराज और डोमराज के बीच आत्मीय संबंध थे। रामनगर की रामलीला में डोम राजा के दो इक्के और एक जीप खड़ी रहती थी। पूरे डोम परिवार में रामलीला देखने की परंपरा थी। कई बार राजा साहब ने कहा कि आप लोगों के लिए विशेष गाड़ी और जमीन की व्यवस्था करवा दूंगा, लेकिन हमने इन्कार कर दिया। काशीराज और डोमराज हर शिवरात्रि पर केदारनाथ और विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने जाते थे।

एक बार पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी की बहू का शव घाट पर आया। त्रिपाठी जी ने कहा कि पहली अग्नि आप दें। मैंने मना करते हुए कहा कि बहूजी ने ही 75 लाख रुपये की लागत से बिजली शवदाह गृह बनवाया है, फिर लकड़ियों पर अंतिम संस्कार क्यों? जब हमने इस व्यवस्था का विरोध किया था, तब बहूजी ने कहा था कि वहां केवल लावान्सश और गंगा में बहने वाले पशुओं के शव जलेंगे, लेकिन बाद में सभी शव वहीं जलने लगे। हम कालू डोम की पीढ़ी से हैं।

गंगा किनारे अब हमारे पास केवल यादों का पिटारा बचा है। इन घटनाओं की न कोई रिकॉर्डिंग है और न कोई तस्वीर सुरक्षित है। शादी के तीसरे साल ही पति का निधन हो गया। बाद में उनके छोटे भाई और डोमराज कैलाश चौधरी के निधन के बाद मैंने मसान की पारियों की जिम्मेदारी संभाली और महिलाओं में उसे बांटा। मणिकर्णिका पर कभी मसान की रानी तो कभी राजमाता बनकर परंपरा को आगे बढ़ाया। पहले महिलाओं को सिर उठाने तक की मनाही थी। पति के निधन के बाद दोबारा विवाह के बारे में सोचना भी गुनाह माना जाता था। मेरी शादी नौ साल की उम्र में हुई, तीन साल बाद गौना हुआ और फिर तीन साल बाद पति का निधन हो गया। -जमुना देवी, डोम परिवार की राजमाता, मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट
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